डॉ डी एम मिश्र की एक ग़ज़ल 'सिर्फ़ सत्ता का उन्हें सुख चाहिए, फिर कुछ नहीं..'



शौक़िया कुछ लोग चिल्लाने के आदी हो गये
पर, यहाँ अफ़वाह फैली लोग बाग़ी हो गये।

महफ़िलों में आ के खु़ददारी बयाँ करते रहे
पर, सरे बाज़ार बिक जाने को राज़ी हो गये।

@डॉ डी एम मिश्र    


सिर्फ़ सत्ता का उन्हें सुख चाहिए, फिर कुछ नहीं 
कल तलक वो साइकिल थे आज हाथी हो गये।

ले गये बच्चों के मुँह का जो निवाला छीनकर
आँकड़ों के खेल में वो प्रगतिवादी हो गये।

वो अगरचे लूटता है, तो बुरा क्या है मगर
उठ पड़े मज़दूर तो आतंकवादी हो गये।

ओ मेरे तालाब की भोली मछलियो सावधान
ये वही बगुले हैं जो कहते हैं त्यागी हो गये।




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