गोद लेने और ठेके देने में फर्क होता है, लाल किला पर विश्वास ने कहा 'निकम्मी औलाद, “पुरखों की विरासत” बेच देती है'



केन्द्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय महत्व के धरोहरों को विकसित करने और देख रेख करने के लिए एक पॉलिसी शुरू की थी. इसे ‘धरोहर को गोद लेने’ की योजना बताया जा रहा है, जबकि गोद लेने में और ठेके पर देने में फर्क होता है. गोद अपनी स्वेच्छा से अच्छा करने के लिए लिया जाता है और ठेका केवल और केवल लाभ लेने के लिए लिया जाता है. 

पर्यटन मंत्रालय के अनुसार डालमिया समूह ने 17 वीं शताब्दी की इस धरोहर पर छह महीने के भीतर मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने पर सहमति जतायी है. इसमें पेयजल कियोस्क, सड़कों पर बैठने की बेंच लगाना और आगंतुकों को जानकारी देने वाले संकेतक बोर्ड लगाना शामिल है. समूह ने इसके साथ ही स्पर्शनीय नक्शे लगाना, शौचालयों का उन्नयन, जीर्णोद्धार कार्य करने पर सहमति जतायी है. इसके साथ ही वह वहां 1000 वर्ग फुट क्षेत्र में आगंतुक सुविधा केंद्र का निर्माण करेगा. और यह सब मूलभूत सुविधाएं सरकार मुहैया नहीं कर पा रही थी. 

निश्चित रूप से लाल किला गोद नहीं लिया गया है, उसे सरकार ने ठेके पर देकर, जैसा कि कहा जा रहा है,  एक प्रकार से बेच दिया है. ऐसे में लोगों में गुस्सा होना स्वाभाविक है. जनता में व्याप्त इसी गुस्से को जाहिर करने के लिए कुमार विश्वास ने अपने ट्विटर प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर कहा है कि 'सत्ता की हनक इंसान की, सच सुनने की आदत को खत्म कर देती है.'


उन्होंने ट्वीट किया है,
 “हनक सत्ता की सच सुनने की आदत बेच देती है, 
हया को, शर्म को आखिर सियासत बेच देती है, 
निकम्मेपन की बेशर्मी अगर आंखों पे चढ़ जाए, 
तो फिर औलाद, “पुरखों की विरासत” बेच देती है!”

उनके ट्विट पर कई तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं. इनमें कुछ ये रहीं -


'मिर्ची लगी' से edited : चित्रांश 
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News Digital India 18

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