जब तक कठोर मानदंड नहीं होंगे, व्यभिचार चलता रहेगा



फांसी की सजा मुकर्रर की गई, उन लोगों के लिये जो नाबालिग बेटीयों से बलात्कार करते हैं. आम लोगों की तरह मैं भी प्रसन्नता महसूस कर रहा हूँ, लेकिन मुझे याद पड़ता है मोदी जी के सत्ता में आने के बाद अश्लील साइटों को हटाने का प्रयास किया था, लेकिन सांसदों व विधायकों की बड़ी जमात के साथ साथ, सिने जगत व तथाकथित बुद्धिजीवियों ने हाय तौबा मचाकर उनके निर्णय को पलट दिया, जबकि आम जनता बहुत खुश थी. 

महेश भट्ट जैसे इंटेलैक्चुअल सैक्स को नैसर्गिक मानते हुये, सिनेमा और सोशल साइट पर आवश्यक मानते हैं. हर व्यक्ति अपने अस्तित्व में आने की कहानी जानता है, लेकिन समाज का कुछ नियम या मानदंड तो हो ..... मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अंग्रेजी में कहें तो और भी स्पष्ट हो जाता है, man is a social animal, लेकिन यदि कोई नियम नहीं होगा तो social और animal को अलग होते देर न लगेगी. 

आज यदि पदोन्नति में आरक्षण पर अध्यादेश आ सकता है, तो क्यों न पौर्न साइटों को बंद करने के लिये आये. क्यों न देश में ड्रेस कोड आये. क्यों न नैतिक शिक्षा पुन: संजीदगी से आरम्भ की जाये. लोग बलात्कार होने के बाद राग अलापते हैं कि बेटों को नैतिक सीख दें. जबकि कल एक वेबसाइट पर पढ़ रहा था, बचपन में शारीरिक शोषण केवल बेटियों का ही नहीं होता हर पांचवा बालक भी इसका शिकार होता है. फांसी की सजा से रोकथाम तो होगी, पर पूर्णरूपेण होगी, इस पर संशय है, क्योंकि जब तक जीवन जीने के कठोर मानदंड नहीं होंगे, तब तक व्यभिचार चलता रहेगा, आखिर हम जो ठहरे social animal....?

सतना से मृगेंद्र सिंह चंदेल  


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News Digital India 18

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