सजा बढ़ा कर सरकार दिल बहला रही है, इससे अपराध कम नहीं होंगे, जड़ तलाश कर उसमें मट्ठा डालना होगा



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बलात्कार तो बलात्कार होता है, इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए,
पर कोई ठोस कदम भी तो उठाये जाने चाहिए...

रेप की लगातार घटनाओं से घिरने के बाद सरकार ने इस पर नया क़ानून बना कर, सरकार रेप के खिलाफ है, दिखाने का प्रयास किया है, लेकिन वह इसमें भी सफल नहीं हो सकी. आम जनता अब उतनी बेबकूफ नहीं है, जितना कि उसे समझा जा रहा है. देश की जनता यह बात अच्छे से समझ रही है कि सरकार ने नए क़ानून से केवल और केवल अपना खुद का और देश की जनता का दिल बहलाने का काम किया है. मूल मुद्दे पर समस्या और उसके समाधान को लेकर सरकार जरा भी गंभीर नजर नहीं आई. देखा यह जाना चाहिए था कि इस तरह के अपराध दिन व दिन क्यों बढ़ रहे हैं, जो कि नहीं देखा गया, क्योंकि केवल दण्ड बढ़ाने से अपराध कम नहीं होंगे. 

सामान्यतः कोई भी अपराधी, अपराध घटित करते समय कानूनी प्रावधानों, धाराओं, सजाओं के बारे में नहीं सोचता? फिर यौनिक उत्तेजना के वशीभूत हो पूर्णतः जानवर बन चुके व्यक्ति से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह अपराध घटित करते समय यह देखेगा कि उम्र कितनी है? 12 वर्ष,16 वर्ष या अधिक? और उसकी सजा क्या होगी? 7 वर्ष या 10 वर्ष? उम्र कैद या फांसी? इस सबसे अपराधी पर कोई रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला.  

इस प्रकार के गंभीर अपराध न हों, के लिए आवश्यक है कि हम अपराध की जड़ कहाँ है, उसे ढूंढें और उसमें मट्ठा डालें. जड़ में हैं ऐसे अपराधों को बढ़ावा देने वाले संसाधनों की आसानी से उपलब्धता, भोगवादी मानसिकता, व्यावसायिक विज्ञापनों में स्त्री को वस्तु के रूप में पेश किया जाना. अनैतिकता के सारे काम खुले आम हो रहे हैं. सरकार स्कूल बंद कर रही है. थाने बढ़ाये जा रहे हैं. गाँव-गाँव शराब की दुकानें खोली जा रही हैं. देश की जनता खास कर युवाओं के सामने आये दिन बड़े नेता खोखले आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं. सरकार वोट की राजनीति के तहत देखती है, किसके खिलाफ कार्यवाही करनी है और किसको बचाना है. 

देश के युवाओं का बेरोजगार होना, उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिलना, परेशान होकर उनका नशे की गिरफ्त में चले जाना, हर हाथ में मोबाइल और उस पर उपलब्ध अश्लीलता भी एक बड़ा कारण है. इसी के साथ परिवार का विघटन भी एक बड़ा कारण है. यही समस्यायें, बीज का काम कर रही हैं. और इनके इलाज के लिए अच्छी नैतिक शिक्षा, शिक्षा के बाद ठीक से रोजगार, सबको बराबर हक़, गंदी चीजों का खात्मा, लेकिन हम भटक रहे हैं. 

सरकार सजा बढ़ा कर मन बहला रही है. असल समस्या पर कोई बात नहीं हो रही है. देश में एक अच्छा माहौल बने, झूंठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार ख़त्म हो, तो यह समस्या क्या, कोई समस्या नहीं रहे, लेकिन तब समस्या यह है कि फिर राजनीति कैसे होगी? गंदी राजनीति ने तो क़ानून का ही मजाक बना रखा है. न्याय में लगता लंबा वक्त भी एक बड़ी समस्या है. फरियादी न्याय की चौखट पर ही दम तोड़ देता है. दण्ड के लिए कम से कम समय सीमा ही निर्धारित हो जाए तो कुछ काम बने. 

@ चित्रांश   



छोटा रेपिस्ट - बड़ा रेपिस्ट
मामले पर Divya Srivastava लिखती हैं कि व्यक्ति की आय के आधार पर इनकम टैक्स के स्लैब तो सुने थे लेकिन अब स्त्री की उम्र के आधार पर छोटी सज़ा, बड़ी सज़ा, मीडियम सज़ा दी जाएगी। कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि कल को ये मूर्ख ये नियम बना दें कि रेप अपराध की श्रेणी में ही नहीं आता बल्कि माचो मैन द्वारा किया जाने वाले उपकार है स्त्रियों पर, और रेपिस्ट ही उल्टा मुकदमा दायर कर दे युवती पर की इसकी बढ़ती उम्र के अनुसार मुझे मज़ा कम आया और मेरा टाइम एनर्जी वेस्ट हुआ इसलिए अदालत 'पीड़ित-रेपिस्ट' को मुआवजा दे।

जनप्रतिनिधि, नारी गरिमा के प्रति संवेदन शून्य
वहीं K.k. Gautam ने लिखा हैं कि रेप मैं दो क्राइम गिने जाते हैं, शारीर पर हमला/ चोट दूसरा स्त्रियोचित लज्जा पर चोट। दूसरा अपराध ज्यादा घातक है क्यौकि वह कभी ठीक नहीं होता। स्त्रियोचित गरिमा बालकपन से युवावस्था की ओर चलने पर बढती जाती है, इसके साथ ही आपराध की गम्भीरता भी बढ जाती है, ये पहले के लीडिंग केसेज मैं न्यायपालिका स्पस्ट कर चुकी है अपने फैसलौं मैं। न्यायपालिका के फैसले स्वयमेव अकाट्य कानून ही होते हैं। ये जो दण्ड के स्लैव तय किये हैं, इनमें शारीरिक चोट पर ही ध्यान दिया है, नारी गरिमां की चोट का बिल्कुल नहीं। जबकि गंभीर चोट, या मृत्यु होजाने की स्थिति मैं तो रेप के अतिरिक्त सजा का प्रवधान पहले से है जो मृत्यु दण्ड तक है। इस उम्र आधारित घटती सजा से एक बात तो स्पष्ट है कि हमारे जनप्रतिनिधि, नारी गरिमा के प्रति संवेदन शून्य है, अर्थात उनके मन मैं इसकी कोई कीमत नहीं।





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