डॉ. डी.एम. मिश्र जी की रचना ''पुरुषोत्तम के कमरे में'' एक बार फिर हुई जीवंत, हो रही है सोशल मीडिया पर वायरल



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''जब शील कुमारी के साथ विधायक पुरूषोत्‍म नरेश दिव्‍वेदी ने बलात्कार किया, तब भी देश ठहर सा गया था, आज भी जब उन्नाव की सुकन्‍या का केस सामने है तो देश ठहर सा गया है. और जैसी कि ख़बरें आ रही हैं माना जा रहा है सरकार द्वारा ही मौजूदा विधायक को बचाया जा रहा है... ऐसे में एक बार फिर कवि डॉ. डी.एम. मिश्र जी की यह रचना जीवंत हो गई है और वायरल हो रही है.''  

वायरल हो रही कवि डॉ. डी.एम. मिश्र जी की यह रचना पर अलग अलग बातें की जा रही हैं कोई इसे अश्लील बता रहा है. इसी पर कुमार सुशान्त ने अपनी कलम चलाई है. कुमार सुशान्त लिखते हैं- डॉ. डी.एम. मिश्र जी की एक चर्चित ग़ज़ल है 'पुरूषोत्तम के कमरे में'। इस पर कुछ लोग अश्लीलता का आरोप लगा रहे हैं। वे कौन लोग हैं मुझे उनसे कुछ लेना-देना नहीं। मैं इस ग़ज़ल को अपने ढंग से देखता हूँ। मेरी अपनी दृष्टि है और उसी के अनुसार किसी रचना को देखता हूँ। इस ग़ज़ल के अर्थ को खोलने से पहले ग़ज़ल पाठकों के लिए ये रही - 

पुरुषोत्तम के कमरे में     

रोज किसी की शील टूटती 
पुरुषोत्तम के कमरे में
फिर शराब की बोतल खुलती 
पुरुषोत्तम के कमरे में

गाँव की ताजी चिड़िया भून के 
प्लेट में रखी जाती है
फिर गिद्धों की दावत चलती 
पुरुषोत्तम के कमरे में

अंदर में अंगरक्षक बैठे 
बाहर लगे सुरक्षाकर्मी 
हवा भी आने से डरती है 
पुरुषोत्तम के कमरे में

बड़े-बड़े नेता और अफसर 
क्रांतिकारी कवि डॉ. डी.एम. मिश्र जी
वहां सलाम बजाते हैं
किस्मत बनती और बिगड़ती 
पुरुषोत्तम के कमरे में 

घपला और घोटाला वाली 
भले तिजोड़ी कहीं रहे
चाभी मगर वहीं पर रहती 
पुरुषोत्तम के कमरे में

फिर क्या गरज पड़ी रावण को
सीता का वह हरण करे 
उसे वहीं हर सुविधा मिलती 
पुरुषोत्तम के कमरे में।



यह रचना एक यथार्थ घटना पर लिखी गई है। जो लोग उस यथार्थ घटना को नहीं जानते उनके लिए यह अश्लील ग़ज़ल हो सकती है। जो लोग घटना को जानते हैं, उनके लिए समसामयिक ग़ज़ल है। एक बात और साफ-साफ कह दूँ इस रचना की दूसरी पंक्ति में 'शील' शब्द का प्रयोग किया गया है। मूल रचना में भी 'शील' शब्द का ही प्रयोग किया गया है।दैनिक जनमोर्चा में जब यह गजल छपी थी, तब प्रिंटिंग की भूल से 'सील' लिखा गया और इसी तरह छप गई। यहां समझने वाली बात यह है कि 'शील' और 'पुरुषोत्तम' किसे कहा गया है? 'शील' शीलू नाम की लड़की को कहा गया है, जिसका बलात्कार बाँदा का बसपा का विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी (नाम ठीक से नहीं याद है। केवल इतना याद है कि उसके नाम में एक शब्द पुरुषोत्तम भी था।) ने छह लोगों के साथ अपने घर पर किया था। 'शीलू' विधायक साहब के नौकर की लड़की थी। आज वह विधायक 10 साल की कैद काट रहा है। बाद में मायावती जी ने भी उसे पार्टी से निकाला था। अब कविता पर आते हैं।

इस कविता में शील टूटने का अर्थ है लड़की की अस्मिता का टूटना। ध्यान से देखिए कवि कितना संवेदनशील है कि वह शील भंग होने की बात नहीं कर रहा है। वह शील टूटने की बात करता है। शब्दों के प्रयोग में भी कवि सचेत है। शील भंग होना गंदा शब्द है। शील टूटना नहीं। पहले ही कहा कि शील टूटना का अर्थ अस्मिता का टूटना है। कवि ने यहां शीलू को शील नाम दिया है। शील के माध्यम से कवि शीलू जैसी उन तमाम महिलाओं की आवाज को को बुलंद करना चाहते हैं, जिनके साथ समाज के ठेकेदारों ने गलत किया। कविता में पुरुषोत्तम उस बलात्कारी विधायक के साथ- साथ आज के गलत और गंदे जनप्रतिनिधियों को कहा गया है।

जो लोग रचना के बिम्ब, प्रतीक और रूपक को बिना समझे और यथार्थ से रचना को बिना जोड़े हुए ही बात करते हों उन्हें क्या कहूँ? उनकी समझदारी और लठमार आलोचना पर तरस आती है। अगर यथार्थ को जानते हुए भी वे इसे अश्लील कहते हैं तब वे या तो विधायक जी के आदमी हैं या औरतों के विरोधी !! या फिर वे यह मान लें कि उन्हें रचना की समझ नहीं और वे आलोचक नहीं !!! वे खुद तय करें कि वे किधर हैं। चित भी मेरी और पट भी मेरी तो नहीं चलेगी। 

अब प्रश्न उठता है कि मिश्र जी ने यह रचना क्योँ लिखी? वे चाहते तो निर्भया कांड पर भी लिख सकते थे। यहां भी लेखक की संवेदनशीलता दिखाई देती है। लेखक इसी घटना पर इसलिए लिखता है, क्योँकि जब जनप्रतिनिधि ऐसे घृणित कार्य को करेंगे तो लोग कहाँ जाएंगे? निर्भया कांड को साधरण लोगों ने किया था। उसकी शिकायत जनप्रतिनिधि के पास जाकर की जा सकती है। लेकिन जब जनप्रतिनिधि ही ऐसा काम करेंगे तो साधारण जनता के पास क्या उपाय बचता है? रही बात नारी के प्रति संवेदनशीलता की तो इस रचना में भी उनकी संवेदनशीलता दिख रही है। अगर वे निर्भया कांड पर लिखते तब भी नारी के प्रति उनकी संवेदनशीलता दिखाई देती।

@ कुमार सुशान्त    


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