हम दरबारी ग़ज़ल कहें मंज़ूर नहीं ..





गूॅगे - बहरे बने रहें मंज़ूर नहीं
घिसी -पिटी लेखनी हमें मंज़ूर नहीं ।

सत्ता से हम टक्कर लेते आये हैं
हम दरबारी ग़ज़ल कहें मंज़ूर नहीं ।

सत्य बोलना जुर्म अगर है तो फिर है
झूठ बोलकर खुश रक्खें मंज़ूर नहीं ।

सेाने की भी जाँच कसौटी पर होती
हम हर बात पे हाँ बोलें मंज़ूर नहीं ।

अच्छे दिन के लिए तो जाँ भी हाज़िर है

तिल - तिल करके रोज़ मरें मंज़ूर नहीं ।

अश्कों से भी दिल के दिये जला सकते
अँधियारे में पड़े रहें मंज़ूर नहीं ।

हम बोंलेंगे तभी ज़माना बोलेगा
इंतज़ार अब और करें मंज़ूर नहीं ।

और  यह भी कि ....
न भूलो कि सब कुछ ख़ुदा देखता है ..

बबूलों के पत्तों पे अब ना परोसो
हमारा भरे पेट इतना परोसो ।

भकोसो न सब कुछ अकेले अकेले
ख़बरदार , हमको भी जेवना परोसो ।


विधायक से चाहे मिनिस्टर से पूछो
रहे ध्यान पर हमको कम ना परोसो ।

हमेशा न रहती किसी की हुकू़मत
बही में लिखो हमको जितना परोसो ।


न भूलो कि सब कुछ ख़ुदा देखता है
ग़रीबों को जूठन न अपना परोसो.

यही एक छोटी-सी बस इल्तिजा़ है,
कोई और झूठा न सपना परोसो.


फूल तोड़े गये, टहनियाँ चुप रहीं, पेड़ काटा गया, बस इसी बात पर

आइने में खरोचें न दो इस क़दर,
ख़ुद को अपना क़याफ़ा न आये नज़र.                           
                                                              
रेत पर मत किसी की वफ़ा को लिखो,
आसमाँ तक कहीं उड़ न जाये ख़बर.

तुम अभी तक वहीं के वहीं हो खड़े,
झील तक आ गया ज़लज़ले का असर.

रात कितनी ही लंबी भले क्यों न हो,
देखना रात के बाद होगी सहर.

शख़़्सि‍यत का मिटाने चले हो निशाँ,
ढूँढते हो मगर आदमी की मुहर.

फूल तोड़े गये, टहनियाँ चुप रहीं,
पेड़ काटा गया, बस इसी बात पर.

@ डॉ. डी एम मिश्र, सुल्तानपुर से 





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