घूस खाने की अपेक्षा पाव भाजी खाना ज्यादा उचित

बात खाने और उपवास करने की 

Image result for bhrashtachar

''देश में लोहा, कोयला, रेलवे के डिब्बे, सीमेंट और पुल, सड़क, बिजली स्कूल-कॉलेज, सेना के शस्त्रों को पचाने की शक्ति हमारे नेताओं में है. उनको खा जाते हैं और डकार तक नहीं लेते हैं. तो पाव भाजी या बर्गर, पिज़्ज़ा, बीफ, मछली, अंडा शराब की क्या बिसात? और तो और अब तो कौन झंझट में पड़े सीधे सीधे नोट खाओ और रवाना हो जाओ. ऐसी स्थिति में खाने को लेकर बातें करना कितना उपयोगी है? बात तो तब हो जब हम देश में आम आदमी को खाने के लिए भटकना न पड़े के लिए कोई उपाय करें, आम समस्याओं के निराकरण की बात करें. ''

@ डॉक्टर अरविन्द जैन, भोपाल   

वैसे संसार को देखना हो तो अपने शरीर को देख लो .संसार की संरचना शरीर से हुई या शरीर की रचना संसार से हुई.दोनों में बहुत गन्दगी हैं .जैसे कहा गया हैं  दिपै काम चादर मढ़ी, हांड पींजरा देह, भीतर या सम जगत मैं और नहीं घिन घेय, यानि हमारे शरीर की चमड़ी को हटा दिया जाए तो जैसे शंसार में अशुचिता है, वैसे ही संसार में अशुचिता है. पूरा संसार इतना घिनौना है जिसे आप देख नहीं सकते. वैसे ही शरीर की चमड़ी हट जाए या हटा दी जाए तो हम अपनी शरीर का देखना पसंद नहीं करते. दूसरा शरीर खलु साधनम, अर्थात सब रोग का मूल स्थान हमारा शरीर हैं. एक एक रोम में सैकड़ों बीमारियां होती हैं और हमारा शरीर दोष, धातु और मलों से निर्मित हैं, इनका सामान अवस्था में रहना स्वास्थ्य और असमान होना रोग. और इसका इलाज हैं सब दोषों को समान अवस्था में लाना चिकित्सा. रोगस्तु दोष वैश्याम, दोष समयँम आरोग्यता .

Image result for भूखा आदमी

वैसे कहा जाता हैं कि आपकी जठराग्नि समान हैं तो पाचन तंत्र ठीक रहता हैं और जठराग्नि का असंतुलन होना पाचन रोगों का होना,पाचन तंत्र से ज्वर, अतिसार (दस्त ) प्रवाहिका (आंव ) ग्रहणी और उसके बाद भस्मक रोग होता हैं .यदि पाचन ठीक हैं तो सब कुछ पच जाता है .आयुर्वेद में कारण पर जोर दिया जाता हैं और उसको ठीक करने से रोग मुक्त होते हैं. आधुनिक चिक्तिसा शास्त्र रोग को मुक्त करता हैं कारण को नहीं देखता. दूसरा आयुर्वेद स्वास्थ्य की सुरक्षा करता हैं ये रोग का इलाज करते हैं .

Related image
भूँखा था ,चावल चुराया तो मार डाला गया गरीब आदिवासी ...

हमारी राजनीति भी पाचन तंत्र जैसी हैं .सब राजनैतिक पार्टियां खूब अच्छा पाचन तंत्र होने से घूस/भ्रष्टाचार /सुविधा शुल्क के नाम पर भरी रिश्वत कहते हैं और वे पकड़े नहीं जाते और जिनका तंत्र कमजोर होता है तो उनको वमन (उलटी) दस्त, आंव, ग्रहणी तक तो ठीक हैं पर जब भस्मक रोग हो जाता है तो वह रोग खुद नहीं छिपा सकते और उसका इलाज होना अनिवार्य है और उसमे चिकित्सक कारण जानना चाहता है.

हमारे देश में लोहा, कोयला, रेलवे के डिब्बे, सीमेंट और पुल, सड़क, बिजली स्कूल-कॉलेज, सेना के शस्त्रों को पचाने की शक्ति हमारे नेताओं में है. उनको खा जाते हैं और डकार तक नहीं लेते हैं. तो पाव भाजी या बर्गर, पिज़्ज़ा, बीफ, मछली, अंडा शराब की क्या बिसात? और तो और अब तो कौन झंझट में पड़े सीधे सीधे नोट खाओ और रवाना हो जाओ. ऐसी स्थिति में खाने को लेकर बातें करना कितना उपयोगी है? बात तो तब हो जब हम देश में आम आदमी को खाने के लिए भटकना न पड़े के लिए कोई उपाय करें, आम समस्याओं के निराकरण की बात करें. 


Related image
हम इनकी बात कब करेंगे ?

सत्ता पक्ष अपने आपको ऐसा बता रहा हैं की उन्होंने उपवास/अनसन की बहुत अभ्यास किया हैं जिस कारण उन्हें भूख नहीं लगती .उन्होंने मात्र दो वर्ष के अंदर अपना मुख्यालय बना लिया शायद मोदी की कृपा से सब काम चंदा और सहयोगियों ने किया हैं. देखो वर्षा के जल से कभी भी नदी में बाढ़ नहीं आती, जब तक उसमे नदी नालियों का पानी न मिले. सत्ता पार्टी को नित्य नए चुनाव लड़ना और जीतना तथा जहाँ सरकार नहीं बन सकती शायद वचनों से, भाषण से जीतती होंगी, क्योकि सत्ता पार्टी धन को हाथ का मैल कहती है, उसको स्पर्श नहीं करती, पर पुण्य का ठाठ है धन की गंगा बह रही है. गंगोत्री का मुहाना छोड़ा और समृद्ध हो गया है. 

नदी का एक किनारा कहता है कि काश में उस किनारे में होता तो अधिक सुख मिलता, दूसरा कहता मैं पहले की तरफ होता तो कितना अच्छा होता. चिड़िया कहती है काश में बादल होती, तो पूरा संसार घूम लेती और बादल कहता कि मैं चिड़िया होती तो मैं पूरा संसार घूम लेती. जब बच्चा पालने में होता है तब उसे पालना बड़ा लगता है और जब वह युवा होता है तब उसे संसार छोटा लगने लगता है! 

कुछ लोग खा पीकर अनशन में जाते हैं. कई तो निपट सुलझकर पीकर होकर जाते हैं. क्या करें सबकी अपनी अपनी तासीर. मोदी जी अमेरिका गए तो उन्होंने नीबू पानी पिया, पर उनके मंत्री मुर्गा मुसलम, शराब खोरी करते हैं, तो उसमे हम क्या कर सकते हैं? अरे भाई सामने पाव रोटी खाते मिल गए और पकडे गए. कुछ काम ऐसे होते हैं, जो नौ माह बाद दिखते हैं. यह अपनी अपनी कमजोरी है.

सत्ता पार्टी बंद कमरे में सब काम करती है, जिससे उजागर नहीं होते, पर क्या करें कांग्रेस का मुखिया नौजवान है तो खुलेआम करता है. उससे क्या फर्क पड़ता है. देखो तर्क बहुत होते हैं और विवाद राजनीति का अंग है. बात मतलब की यह है कि जो समस्या उठाई जा रही है वह कितनी सार्थक है. कमाल है संघ, भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार दलित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है, मगर समान नागरिक संहिता लागु करने में, जातिवाद को प्रतिबंधित करने में, राम मंदिर बनाने, धारा 370 हटाने, जनसँख्या नियंत्रण करने, बांग्लादेशियों को भगाने, पाकिस्तान के हिन्दुओं को बसाने, गौहत्या कानून बनाने और ईसाई धर्मांतरण पर प्रतिबन्ध लगाने वाले अध्यादेश लाने का कभी विचार नहीं करती है.

मुख्य समस्याएं निपटाएं 
इसमें न उलझे 
कांच के महल में सब बैठे हैं. 
हमाम में सब नंगे हैं, 
विफलता को मत छिपाएं.


Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc