सच यही है कि रखरखाव के नाम पर बेंच दिया गया है लाल किला




सरकार की नियत पर संदेह, धरोहरें निजी एजेंसियों को सौंप कर
उन्हें भविष्य का मालिक बनाया जा रहा है

@ डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल 


''सरकार ने लाल किला बेंच दिया. कुछ लोग तर्क दे रहे हैं बेंचा नहीं है, रखरखाव के लिए दिया है. तो क्या अब सरकार देश की धरोहरों का रख रखाव भी करने की स्थिति में भी नहीं है? आपत्ति करने वालों का कहना है कि बात 25 करोड़ की नहीं है, असल में सरकार की नियत पर संदेह है कि वह एक प्रकार से ये धरोहरें ऐसी निजी एजेंसियों को सौंप रही है, जो भविष्य में उनकी मालिक बन जायेंगी.''

लाल किला, ताज महल के बाद साँची पर भी निगाहें?

अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वश्रेष्ठ ISO रेलवे स्टेशन हबीबगंज को निजी एजेंसी को सौंपा गया, अब वहां आये दिन विवाद हो रहे हैं. निजी एजेंसी ने पार्किंग शुल्क कई गुना बढ़ा दिया है और पब्लिक को लूटा जा रहा है. यही हाल अब लाल किले का भी होना तय है, आखिर वह अब सरकार की सम्पत्ति जो नहीं रह गया है, निजी एजेंसी जैसा चाहेगी वैसा करेगी. बताया जा रहा है ताज महल भी इसी प्रकार बेंच दिया गया है. देखना यह है कि अब अगला नंबर किस का लगेगा. सुनने में आ रहा है साँची पर भी निगाहें जा रही हैं. 

कहा जाता है कि राजा महाराजओं ने इतने बड़े-बड़े महल, किले बनवाये, ये शोषण के प्रतीक हैं. कारण इनका निर्माण कैदियों से और मजदूरों से बहुत कष्ट देकर करवाया गया और इतने बड़े बनवाये कि आज वर्तमान सरकार की इतनी हैसियत भी नहीं है कि वह इनकी सुरक्षा, संरक्षण और रख रखाव कर सके. जब अधिग्रहीत किये गए थे, तब गर्व महसूस होता था और अब सरकार अपने शौक, अपने खर्चे के लिए सब उपाय कर लेती है, पर इन ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए अप्रत्यक्ष्य में बेचने को तैयार हो गयी. बेचने का आशय सरकार ने 'लाल किला' डालमिया को दिया, सरकार बदल गयी और नयी सरकार करारनामा भूल गयी, तो पता चला 'लाल किला' डालमिया के पूर्वज ने बनवाया था.

भारत सरकार इतनी अधिक कमजोर हो गयी है कि वह देश की धरोहरों का रखरखाव निजी एजेंसियों से कराने विवश है. क्या सरकार यह नहीं जानती कि निजी एजेंसियों का लक्ष्य दान या उपकार का भाव न होकर शोषण का होगा, जो टिकिट वर्तमान में हैं, वह कई गुना बढ़ा दी जाएंगी. ऐसे में दर्शक कम होंगे. क्योंकि वैसे भी अब प्राचीन धरोहरों को देखने की लोगों में ज्यादा रूचि नहीं रही. तब फिर धीरे धीरे समय बीतते ये धरोहरें निजी हो जायेंगी. 

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आपत्ति करने वालों का कहना है कि बात 25 करोड़ की नहीं है, असल में सरकार की नियत पर संदेह है कि वह एक प्रकार से ये धरोहरें ऐसी निजी एजेंसियों को सौंप रही है, जो भविष्य में उनकी मालिक बन जायेंगी. वैसे भी दस्तावेजों की हेरा फेरी सामान्य बात है. जैसे ताजमहल के लिए कोर्ट ने कहा कि शाहजहां के दस्तखत लेकर आओ. इस प्रकार देखा जाये तो भविष्य में कुछ धरोहरों पर माल्या, नीरव, सहारा जैसे लोग अपना अधिपत्य बताकर उनके मालिक बन जायेंगे और किये गए समझौतों में सरकार की ओर से हस्ताक्षर करने वाले कोई मंत्री, सचिव भी हिस्सेदार बन जायेंगे और फिर सरकार राम मंदिर बाबरी मस्जिद जैसे मुकदमे में उलझकर सिद्ध नहीं कर पाएंगी की वास्तव में यह धरोहर पुरानी है, सरकार की है या निजी मालिक की हो गयी. 

सरकार लोक कल्याणकारी राज्य है, जो जनता के लिए करती है, पर सरकार कुछ धनवान और ऐसे लोगों से संपर्क कर धरोहरों को बेचने की स्थिति में आ गयी है, जब कोई व्यक्ति करोड़ों रुपये खर्च करेगा तो उससे अधिक कमाई भी करेगा! कोई क्या जन कल्याण के लिए बैठा है? पता नहीं सरकार भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर बड़ी योजनायें बनाने की बात करती है और धरोहरें, जो देश का गौरव होती हैं, उन्हें बेंचने पर तुली है. 

क्या सरकार प्रत्येक प्राचीन किले, महल, धरोहरों को योजनाबद्ध ढंग से उनका रख रखाव, लिपाई पुताई नहीं कर सकती, जो ऐसा कर रही है. कैसे मान लें कि बेंचा नहीं जा रहा. बेहतर होता कि व्यवस्थाएं ठीक की जातीं, और अनेक लोगों को नौकरी और व्यापार दिया जाता. खरीदने वाले निजी लोग मात्र शोषण ही करेंगे और अपनी प्रभुता बताएँगे. 

यह हो सकता है कि सरकार भ्रष्टाचार को नहीं रोक पा रही है इससे धरोहरों पर पुर्ननिर्माण/रख रखाव में घटिया गुणवत्ता का बोलबाला रहता है. सो वह निजी एजेंसियों को सौंप कर अपना पिंड छुडा रही है. लेकिन भारत के अनेकों स्थलों को निजी एजेंसियों को सौपना भविष्य में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद जैसे विवाद का कारण होंगे. निजी लोग स्थान स्थान पर अपनी पहचान बनाये रखने चिन्हित करेंगे और उसके बाद आधिपत्य जमाएंगे. हमारे यहाँ की लाल फीताशाही और नेताओं की मानसिकता तनिक से लोभ में बिक जाती है और कोई न कोई प्रभावशाली मंत्री कोई स्मारक अपने पुरखों के नाम से कराकर जिंदगी भर उसका उपयोग कर अपनी मिलकियत बनाकर रखेगा. 

इस विषय पर गंभीर चिंतन-मनन और दूर-दर्शिता की जरुरत है, अन्यथा विवादों में ले जाना हमारी फितरत है और कानून का शिकंजा अनेक पीढ़ियों तक चलता है. सरकार जनता पर और टैक्स लगाए, टिकट इतनी अधिक महंगी कर दे कि कोई उनको देखने ही न जाए. इस प्रकार धरोहरों को  निजी एजेंसियों को सौपना सरकार का दिवालियापन ही दिखाता है.


अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वश्रेष्ठ ISO रेलवे स्टेशन हबीबगंज को निजी एजेंसी को सौंपा गया, अब वहां आये दिन विवाद हो रहे हैं. निजी एजेंसी ने पार्किंग शुल्क कई गुना बढ़ा दिया है और पब्लिक को लूटा जा रहा है. 



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