राज्यों में सत्ता विरोधी लहर(Anti Incumbency) से निपटने सरकारें लगा रहीं पूरा जोर, विश्लेषक बताते हैं 'हुजूर आते आते बहुत देर कर दी..'

Image result for शिवराज और वसुंधरा राजे

''देश में कोई भी चुनाव हों, कहा जाता है की ये देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे. ऐसा ही कर्नाटक चुनाव को लेकर भी कहा जा रहा है, लेकिन इतना तय है कि ये चुनाव देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करे न करे, लेकिन इसके बाद होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे अवश्य देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे. इसके बाद बनने वाले समीकरण यकीनन बड़ा झटका देंगे.''

इन तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं. यहाँ सत्ता विरोधी लहर(Anti Incumbency) देखी जा रही है, हालांकि इससे निपटने सरकारें पूरा जोर लगा रही हैं. पर विश्लेषक बताते हैं कि बहुत देर कर दी गई है. इसके बाद माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है और इसका खामियाजा बीजेपी को उठाना पड़ सकता है. हालांकि यह भी माना जा रहा है कि केंद्र सरकार स्थिति संभाल ले तो राज्यों में जो स्थिति राज्य सरकारों की है वैसी अभी केंद्र सरकार की नहीं है. खासकर मोदी का जादू अभी भी पूरी तरह उतरा नहीं है. 

राजस्थान में 'रानी तेरी खैर नहीं, मोदी तुमसे बैर नहीं', नारा चल रहा है तो वहीं मध्यप्रदेश में भी 'मामा तेरी खैर नहीं, मोदी तुमसे बैर नहीं' चल रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ये नारे इन सरकारों के खिलाफ खासे नाराज हैं. लगभग यही स्थिति छत्तीसगढ़ में भी बन रही है. यही देख कर शायद सरकार सोशल मीडिया पर सख्ती की योजना बना रही है, जो कि उलटा दांव हो सकता है. लेकिन अभी भी मोदी को लेकर उतना विरोध नहीं देखा जा रहा. क्योंकि कोई ठीक से योजना तैयार नहीं की गई तो यह मोदी सरकार के खिलाफ भी माहौल बनते देर नहीं लगेगी. 

यही कारण है कि कर्नाटक में कांग्रेस ने चतुर सियासी चाल चलते हुए स्थानीय मुद्दों पर लड़ने का फैसला किया है. कांग्रेस की कोशिश है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को सीधी चुनौती न दे. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया शातिर सियासी खिलाड़ी हैं. इसीलिए उन्होंने चुनाव से महीनों पहले कन्नड़ उप-राष्ट्रवाद को हवा देनी शुरू कर दी थी. उन्होंने कर्नाटक के अलग झंडे को मंजूरी दी. उन्होंने ताकतवर लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने का कदम उठाया, ताकि उन्हें हिंदुत्व के मोर्चे से अलग कर सकें.

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में स्थिति इसके विपरीत है. वहां सिद्धारमैया अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए हैं.इतना ही नहीं वे पहले ऐसे मुख्यमंत्री भी हैं, जो विपरीत स्थिति में भी जनता की पसंद बने हुए हैं. 2013 में कांग्रेस ने सत्ता वापसी की थी तब सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया. सिद्धारमैया 40 साल बाद पहले ऐसे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया हो. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है. अगर 2018 के विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस वापस सत्ता हासिल करती है तो यह भी एक रिकॉर्ड हो जाएगा. कर्नाटक में सभी 224 सीटों पर 12 मई को मतदान होना है और मतगणना 15 मई को होगी. 


@ चित्रांश  

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc