सरकार को विरोधी लहर(Anti Incumbency) से बचाने भर का काम कर रहा है नोटा




''एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये आवश्यक है कि चुनाव प्रणाली पूरी तरह स्वच्छ हो, पारदर्शी हो, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश का भविष्य इसी बात पर टिका है. लेकिन नोटा की बात करें तो यह केवल और केवल सरकारों को विरोधी लहर(Anti Incumbency) से बचाने भर का काम कर रहा है. जब इसको मिलने वाले मतों का कोई मतलब ही नहीं है, तो आखिर नोटा को वोट क्यों दिए जाएँ? देश में स्वच्छ लोकतंत्र के लिये जरूरी है कि हम इस पर मंथन करें.'' 

पिछले दिनों ऐसे ही एक उस गली से गुजर रहा था, जहाँ एक मित्र रहते हैं. फ्री था, याद आ गई. सोचा क्यों न कुछ समय गपशप कर ली जाए. चला गया, इधर उधर की बातों के बीच मौसम चुनाव का था, सो चुनाव पर चर्चा छिड़ गई. चाय लाने के साथ ही भाभी जी भी हाल में बैठ गईं थीं और चर्चा में शामिल हो गईं. बात थी कि भाई साहब कह रहे थे -हम तो भैया हमेशा से ही कांग्रेस को वोट देते आये हैं, उसे ही देंगे, लेकिन भाभी जी तैयार नहीं थीं. उनका कहना था हम तो इस बार बीजेपी को ही वोट देंगे. कांग्रेस को बहुत देख लिया. अंततः तय हुआ कि भाई साहब कांग्रेस को वोट देते आये हैं, सो उसे ही देंगे, और इस बार भाभी जी कांग्रेस से खासी नाराज हैं, सो वह बीजेपी को ही वोट देंगी.

मैंने कहा ऐसा करना आप दोनों वोट डालने ही नहीं जाना, एक एक वोट दोनों तरफ बढ़ाने से फायदा भी क्या होने वाला है. दोनों को ही बात समझ आई कि सही तो हो फिर वोट का मतलब ही क्या रह जाएगा. और फिर मिलकर एक को ही वोट देना तय कर लिया गया. लेकिन इसी के साथ एक बात और खास हुई, जो इस लेख के लिखने का कारण बनी. बात निकली नोटा की. 

आपको याद होगा एक समय 'राइट टु रिजेक्ट' को लेकर बहुत शोर हुआ, सरकार तैयार नहीं थी. और देश यह मांग जोरों से कर रहा था. तब निकलकर आया नोटा, और क़ानून बन गया. नोटा (None of The Above उपरोक्त में से कोई नहीं) मतदाता को यह अधिकार देता है कि यदि उसे कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं आता है तो वह नोटा को अपना मत देकर वह किसी ख़ास सीट से चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदान नहीं करे. सच तो यह है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये बेहतर निर्वाचन प्रणाली आवश्यक है, लेकिन हमारे देश में निर्वाचन प्रणाली ही दोषपूर्ण होकर कई समस्याओं की जननी बन रही है. 






जीत को प्रभावित कर सकते हैं नोटा मत 
एक जानकारी के अनुसार नोटा की शुरआत 2013 में छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव से हुई थी, जिसके बाद देश में व्यापक तौर से लोकसभा में भी इसका इस्तेमाल किया गया था. 2014 के आम चुनाव में इसमें 1.1 प्रतिशत वोट पड़े थे, जो लगभग 60 लाख लोगों ने दिए थे. गुजरात में हालिया विधानसभा चुनावों में 5.5 लाख से अधिक या 1.8 प्रतिशत मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर नोटा बटन दबाया था. वहां कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत का अंतर नोटा मतों की संख्या से कम था. उल्लेखनीय है कि गुजरात विधानसभा चुनावों में नोटा मतों की संख्या कांग्रेस एवं भाजपा को छोड़कर किसी भी अन्य पार्टी के मतों की संख्या से अधिक थी. कहने का तात्पर्य है कि यदि यह मत नोटा में न जाकर निकटतम हारने वाले प्रत्याशी को मिल गए होते तो जीतने वाला प्रत्याशी न. 2 पर आ जाता. क्योंकि यह माना गया कि नोटा को मिले मतों के पीछे सरकार विरोधी लहर (Anti Incumbency) प्रमुख कारण था.  

हाल में गुजरात  विधानसभा चुनाव निपट चुके हैं. अब फिर देश के प्रमुख राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी जोरों पर है. और कर्नाटक में 12 मई को वोटिंग होना है. अब यदि इन चुनावों में एक भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जो स्वच्छ छवि का हो, जिसे हम अपने आगे खड़ा करके गर्व से यह कह सकें कि यह हमारे नेता हैं, ऐसे में क्या करें? ऐसी स्थिति में हमारे पास 3 विकल्प हैं, पहला यह कि हम उनमें से सबसे कम 'बुरे' को चुनें, दूसरा यह कि हम 'नोटा' का इस्तेमाल करते हुए सभी प्रत्याशियों को नकार दें और अंतिम यह कि हम वोट ही डालने न जाएं. इसके अलावा कोई और ठोस विकल्प फिलहाल हमारे पास नहीं है. 



अगर आप कम 'बुरे' को चुनेंगे तो बाद में उसके द्वारा किए गए 'छोटे कुकर्मों' के लिए आप भी जिम्मेदार कहे जाएंगे और अगर वोट डालने नहीं जाएंगे तो संभव है कि आपके स्थान पर कोई और वोट डाल दे. साथ ही नहीं डालने जायेंगे तब भी क्या होगा? कोई न कोई कम वोटों से ही सही जीत तो अवश्य जाएगा. और अगर आप नोटा दबाएंगे तो भी आपका वोट 'बर्बाद' ही होगा, क्योंकि उसका कोई मतलब ही नहीं है. इससे बस इतना फर्क पड़ेगा कि आपका वोट कोई और नहीं डाल पाएगा, लेकिन अगर आपको कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं आता है तो क्या 'नोटा' दबाने से सच में कोई लाभ होने वाला है? तो इसका जवाब है 'नहीं. बल्कि सच तो यह है कि नोटा केवल और केवल सरकारों को Anti Incumbency विरोधी लहर से बचाने का काम कर रहा है. जब इसको मिलने वाले मतों का कोई मतलब ही नहीं है, तो आखिर नोटा को वोट क्यों दिए जाएँ? 

नोटा को मिले मत, योग्य मत नहीं   
आपको शायद जानकारी नहीं हो कि मतगणना के दौरान नोटा मतों की गिनती अन्य सभी उम्मीदवारों के मतों की गिनती की तरह ही होती है, लेकिन किसी भी स्थिति में नोटा को मिले मत, योग्य मत नहीं माने गए हैं. इस कारण इन मतों का चुनाव में हार-जीत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि फैसला योग्य वोटों के आधार पर ही होता है, फिर चाहे उम्मीदवार को सिर्फ एक वोट ही क्यों न मिला हो.



इसे इस प्रकार समझिये, मान लीजिये किसी चुनाव क्षेत्र में 5 लाख वोट हैं. कुल वोट प्रतिशत रहा 60. मतलब वोट डाले गए 3 लाख. अब मैदान में प्रत्याशी हैं 14. इनमें एक नोटा जोड़ दिया गया. एक को 1 लाख 28 हजार वोट मिले, दुसरे को 1 लाख 17 हजार वोट मिले, तीसरे को 31000. अन्य प्रत्याशियों को 100-200 से लेकर लगभग लगभग 1000 से 1500 वोट मिले. कुल मिला कर शुरू के तीन को छोड़ कर शेष सबको लगभग 5000 वोट मिले और यहाँ नोटा को भी 19000 वोट मिले. तो 1 लाख 28 हजार वोट प्राप्त करने वाला प्रत्याशी जीत गया. 

यहाँ कुल वोट 3 लाख डाले गए, नोटा को प्राप्त 19000 वोट अयोग्य माने जाकर उनका कोई मतलब नहीं होगा. वैध मत संख्या 2 लाख 81 हजार मानी जायेगी. और उसी के अनुसार कुल डाले गए वोटों का 1/6 हिस्सा मत पा गए प्रत्याशी की जमानत जप्त नहीं होगी, शेष सबकी जमानत जप्त हो जायेगी. यह अलग बात है कि जमानत जप्त में भी कोई ख़ास नुकसान नहीं होता. मामूली रकम जो जमानत के तौर पर जमा होती है, वह नहीं मिलती बस. आप देख रहे हैं यहाँ जीत का अंतर मात्र 11000 है और नोटा को प्राप्त मतों की संख्या 19000 है, यानि कि यदि यही मत दुसरे वाले प्रत्याशी को गए होते तो पहले वाले की हार निश्चित थी. 

इस स्थिति पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति नोटा को बहुत बेहतर बताते हैं. उनका कहना है कि नोटा को मिलने वाले मतों का प्रतिशत एक निश्चित प्रतिशत को पार कर जाता है, जैसे अगर विजेता एवं पराजित उम्मीदवार के बीच मतों का अंतर नोटा मतों से कम होता है, तो वहां दूसरी बार चुनाव कराये जाना चाहिए. लेकिन वह इस बात का कोई जबाब नहीं दे सके हैं कि इस प्रकार जो चुनाव पर खर्च बढ़ेगा वह जनता के पैसे का दुरूपयोग ही कहा जाएगा. इसी के साथ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि क्षेत्र में कुल मतदाता 5 लाख हैं और जीतने वाले व्यक्ति को मात्र 1 लाख 28 हजार मतदाताओं का समर्थन मिला है. जबकि वह व्यक्ति 5 लाख व्यक्ति समूह का प्रतिनिधित्व करेगा, कितना हास्यास्पद है? स्वच्छ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि जीतने वाले प्रत्याशी ने कुल मतदाताओं का एक अच्छा प्रतिशत, कम से कम 50% से अधिक वोट प्राप्त किये हों.

नोटा का मतलब 'राइट टु रिजेक्ट' नहीं 
काफी मशक्कत के बाद जब नोटा आया था तो लोगों ने इसे 'राइट टु रिजेक्ट' के तौर पर लिया, आज भी बहुत से लोग इसे उसी रूप में लेते हैं, लेकिन चुनाव आयोग यह स्पष्ट कर चुका है कि नोटा 'राइट टु रिजेक्ट' नहीं है. यदि किसी चुनाव क्षेत्र में सभी उम्मीदवारों से अधिक मत नोटा को मिल जाते हैं, तो भी सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी होगा. 

अब सवाल यह है कि जब चुनाव पर नोटा का कोई असर नहीं पड़ता तो फिर 'नोटा' क्यों? एक जागरूक एवं जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम सरकार से 'नोटा' कानून में संशोधन की मांग करें. यदि किसी चुनाव में 'नोटा' को सर्वाधिक मत मिलते हैं, तो वहां का चुनाव रद्द करके फिर से चुनाव कराए जाएं, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था को नए आयाम मिलें. नए प्रत्याशी आएं और हम उनमें से अच्छे प्रत्याशी का चुनाव कर सकें, साथ ही पूर्व के सभी प्रत्याशी हमेशा के लिए या काफी लम्बे समय के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिए जाएँ.  



आज चुनाव प्रणाली में व्यापक स्तर पर सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है. एक ही प्रत्याशी का कई क्षेत्रों से एक साथ एक पद के लिए चुनाव लड़ना, बाद में कोई एक को छोड़ देना, वहां फिर से चुनाव कराये जाना, कैसे कोई इसे सही कह सकता है. और क्या यह लोकतंत्र का मजाक नहीं? सांसद के लोक सभा चुनाव हो रहे हैं तो किसी सिटिंग विधायक को मैदान में उतार देना या विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं तो किसी सिटिंग सांसद को टिकिट दे देना कहाँ तक उचित है? निश्चित रूप से यदि वह जीत गया तो पुराना पद छोड़ देगा. वहां फिर से समय से पहले चुनाव कराये जायेंगे. इतना ही नहीं विपक्षी पार्टी का व्यक्ति जीत भी गया तो वह केवल सांसद या विधायक बना रह जाता है, और जिसे सत्ता मिल रही है, उसका व्यक्ति हार कर भी मंत्री बन जाता है, क्या यह स्वच्छ प्रणाली कही जायेगी? यदि यह नियम है तो बनाए भी हमने ही हैं, कमियाँ हैं, तो सुधार कौन करेगा? स्वच्छ लोकतंत्र के लिए सभी मतदाता वोट करें यह आवश्यक है, और इसके लिए मतदान अनिवार्य का नियम भी बनाया जा सकता है. वोट नहीं देने वाले से कारण पूछा जाए, बाजिव कारण नहीं होने की दशा में उसको एक नागरिक की हैसियत से मिलने वाली सुविधाओं में कटौती की जाए.

अपव्यय रोकने किसी सांसद/विधायक की मृत्यु हो जाने पर यह सुझाव 
किसी सांसद/विधायक की मृत्यु हो जाने पर चुनाव में अपव्यय रोकने निर्वाचन आयोग को यह सुझाव आया था कि दूसरा स्थान पाए व्यक्ति को मौका दे दिया जाए. जानकारी के अनुसार सुझाव अच्छा माना गया, लेकिन इसमें यह खतरा है कि ऐसे में चुनाव में दुसरा स्थान पाया व्यक्ति प्रथम वाले के साथ कोई हरकत न कर दे. 

अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकार का डंडा  
हाल में यह बात भी सामने आई है कि सोशल मीडिया पर कोई ऐसी पोस्ट न करे जो चुनाव प्रभावित करने वाली हो, अन्यथा कार्यवाही की जायेगी, कहा जा रहा है या यूँ कहा जाए कि सीधे सीधे आम जनता को, किसी भी प्रकार से सरकार के, उसकी नीतियों (गलत भी हैं तब भी) के खिलाफ बोलने वालों को धमकाया जा रहा है. यह अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकार का डंडा  ही कहा जाएगा. राजनैतिक दल खुले मंच पर मुजरे कराएं, सेलीब्रिटी बुलाकर भीड़ जुटाएं, झूंठे आश्वासन दें, पब्लिक को गलत प्रलोभन दें, शराब की पेटियां बाँटें, क्या वह चुनाव प्रभावित करना नहीं है?

उम्मीद पर खरी नहीं उतरी सरकार  
यही वह कारण हैं कि लोकतंत्र दिन व दिन कमजोर पड़ रहा है. यही वह कारण हैं कि 60 साल तक कोई पार्टी ठीक से काम नहीं कर सकी. और यही वह कारण हैं कि तभी तो चेंज किया गया है. लेकिन यह तो कहा जा रहा है कि लम्बे समय से व्यवस्था बिगड़ी हुई थी पटरी पर लाने में समय लगेगा, पर यह नहीं बताया जा रहा है कि कितना? क्या अब फिर अगले 60 साल तक देश की जनता इन्तजार करे? और यह कितना सही होगा? संसद के दरवाजे पर मत्था टेक कर देश की भोली भाली भावुक जनता के हितों से कब तक खेला जाता रहेगा? अरे भाई संसद के दरवाजे पर मत्था टेकने से कुछ नहीं होगा, जरूरी है कि वहां काम कर जनहित के मुद्दों पर बात हो, ऐसे क़ानून बनाए जाएँ, जो जनहित में आवश्यक हैं. 






स्वस्थ लोकतंत्र के लिये आवश्यक है कि चुनाव प्रणाली पूरी तरह स्वच्छ हो
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये आवश्यक है कि चुनाव प्रणाली पूरी तरह स्वच्छ हो, पारदर्शी हो, क्योंकि लोकतांत्रिक देश में भविष्य इसी बात पर टिका है. लेकिन नोटा की बात करें तो यह केवल और केवल सरकारों को विरोधी लहर (Anti Incumbency) से बचाने का काम कर रहा है. जब इसको मिलने वाले मतों का कोई मतलब ही नहीं है, तो आखिर नोटा को वोट क्यों दिए जाएँ? देश में स्वच्छ लोकतंत्र के लिये जरूरी है कि हम इस पर मंथन करें.

आखिर जनता क्या करे, किसे वोट दे?
ऐसी स्थिति में जनता के पास एक विकल्प यह हो सकता है कि वह केवल वोट नहीं दे, बल्कि यह भी देखे कि वास्तव में सभी प्रत्याशियों में से कौन ज्यादा अच्छा है? या किसे वह सुधार कर लेने के लिए विवश कर सकती है, ऐसा कोई प्रत्याशी मिलता है तो हम न केवल उसे अपना मत दें, बल्कि उसके लिए आगे बढ़ कर काम भी करें. अन्य लोगों को बताएं कि वह सही व्यक्ति है. आम जनता का, देश का ख्याल रखेगा. जो लोग सही हैं, देश के बारे में सोच रखते हैं, वह भी एकजुट हों, और एक दुसरे को भरपूर सपोर्ट सहयोग करें. क्योंकि देखा जा रहा है कि अभी भी राजनीति में अच्छे लोग बहुत हैं, लेकिन दुर्भाग्य कि वह बंटे हुए हैं. एक दुसरे को सहयोग नहीं कर रहे हैं. आज वास्तविक लोकतंत्र के लिए ''clean election is our priority'' मुहिम की आवश्यकता है.  





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