घृणित घटनाओं को मजहबी तराजू में तौलने वालों से प्रश्न

Image result for रेप स्केच

"जाति न पूछो अपराधि की, कर दो ये ऐलान।
  रैपिस्ट को फांसी मिले, हिंदू हो या हो मुसलमान।"

आए दिन देश में हैवानियत की नित्य घृणित घटनाएं घटित हो रही हैं। ऐसी घटनाएं चिंताजनक होने के साथ-साथ  समाज विरोधी हैं और जिसके भी साथ घटित हो रही हैं, उसके दुख-दर्द, तड़प और क्लेश का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं।

अभी हाल में कठुआ, उन्नाव, सासाराम और न जाने कितनी ही अनगिनत घटनाएं हमारे संज्ञान में आईं, जिस पर काफी सारी राजनीति हुई, मजहबी उन्माद भी मुखर हुआ। परंतु एक बात समझनी होगी कि एक नारी का दर्द सैकड़ों मजहबों से बढ़कर होता है। इतिहास गवाह है जब जब नारी के सम्मान में ह्रास हुआ है, तत्समय के राष्ट्र और समाज का विनाश ही हुआ है। अगर हम सब इस दुष्प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हुए तो निश्चित रूप से हम मानव कहलाने के लायक नहीं रहेंगे।

प्रस्तुत कविता में मुरैना में पटवारी पद पर कार्यरत श्री यतेन्द्र सिंह सिकरवार जी ने दिल्ली में एक ग्यारह वर्षीय बच्ची के साथ हुई बर्बरता पर अश्रुपूरित विवरण  के साथ ही इस तरह की घृणित घटनाओं को मजहबी तराजू में तौलने वालों से प्रश्न किए हैं- 

इसके अलावा लेखक पटवारी जी श्री यतेन्द्र सिंह सिकरवार का मानना है कि 

"जाति न पूछो अपराधि की,
  कर दो ये ऐलान।
  रैपिस्ट को फांसी मिले,
 हिंदू हो या हो मुसलमान।"
#justice_for_all_and_every_rape_victims

कविता प्रस्तुत है--

धरती मां के सीने में घाव आर पार हो गए।
संस्कारों की बातें करते इंसां शर्म सार हो गए।
हैवानों के बोझ तले मर्यादाएं स्वाहा हुई।
और दिल वालों की दिल्ली में हम दागदार हो गए।
जनरेशन करैक्टर लेस हुई
हालत ओवरटेक हुई
अश्लीलता और पशुता के रिकॉर्ड पार सारे हो गए।
राम-कृष्ण की धरती पर , सिद्धांत रामप्यारे हो गए।
अश्लीलता और पशुता के रिकॉर्ड पार सारे हो गए।

दिल्ली की ना बात अकेली, घिनौना हुआ तमाशा है।
राजा के आंगन में मुंह पर मारा गया तमाचा है ‌।

मारा गया तमाचा है, कदम दर अत्याचार हो गए।
तो आवाज उठाने लड़की की मिल हम एकाकार हो गए।

संवेदना जागी लोगों की, सारा देश तिलमिलाया है।
ऐसे पापियों को कोर्ट ,सजा दिला नहीं पाया है।

मौत से भी बढ़कर हो , सजा ऐसी दिलवा दो।
हिम्मत करे ना कोई दूजा, कानून ऐसा बनवा दो।
Related image
मनु स्मृति में उल्लिखित है  "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता..." तब प्रस्तुत है-

जननी भगिनी देवी लक्ष्मी माना था हमने जिनको।
धरती पर सुंदरता का उपमान दिया हमने जिनको।

तब कुछ प्रश्न करता हूं ---

फिर देवी स्वरूपा नारी को बेबस लाचार बनाया क्यूं!
सहनशील धैर्यवान गुणी को अस्मतहीन बनाया क्यूं !

लज्जा के उस गहने को लज्जाहीन बनाया क्यूं !
 सौगंधे रक्षा की खा कर उसका ही मान घटाया क्यूं !

जिसके आंचल में हम पले बढ़े उसको ही बिलख रुलाया क्यूं‌!
दु:सासन बनकर के उसका चीरहरण करवाया क्यूं!

Image result for रेप स्केच

मगर यह तस्वीर बदलनी है हमें---
  
अमावस और काली घटाओं के दरमियान हर शाम उजियारी चाहिए।
हो जो हरण पांचाली का हर युग में पीतांबर चाहिए।

(महाकवि दुष्यंत कुमार की कालजयी पंक्तियां निवेदित हैं )  

"सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं।
मेरा मकसद ये सूरत बदलनी चाहिए ‌।"

कदम कानून उठाए या मजबूत करें हम खुद को।
फैसला मगर आज होना चाहिए।

हो महफूज़ जहां जननी और भगिनी ऐसा हो भारतवर्ष।
वो तस्वीर सुनहरी चाहिए।

कदम कानून उठाए या मजबूत करें हम खुद को।
फैसला मगर आज होना चाहिए।

हो महफूज़ जहां जननी और भगिनी ऐसा हो भारतवर्ष।
वो तस्वीर सुनहरी चाहिए।

मजहबी ठेकेदारों के झांसे में ना आकर हमें ध्यान रखना होगा कि सबसे पहले हम सब एक इंसान हैं और इंसानियत ही हमारा धर्म, आखिर हम सबका जीवन भी एक महिला से शुरू होता है तब हमें संकल्प लेना है----
    
हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई हो गए,
राष्ट्र तो सबका एक है।
मंदिर पूजूं घूमूं चर्च गुरुद्वारा,
भाव तो सबका एक है।

मां मेरी हो या बेटी बहना हो तेरी,
लाज तो सबकी एक है।
 मां मेरी हो या बेटी बहना हो तेरी,
लाज तो सबकी एक है।

         @ यतेन्द्र सिंह सिकरवार, मुरैना 


Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

1 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका, मुकुट सक्सेना जी

    ReplyDelete

abc abc