सरकार देश की नींव बेरोजगार युवाओं के बारे में नहीं सोच रही है, बल्कि पकौड़े तलने जैसी बातें कर उसका मजाक बना रही है



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किसी भी देश की नींव उस देश का युवा होता है. वह ठीक होगा तो देश ठीक होगा. वह ठीक चलेगा तो देश ठीक चलेगा. 1978 मैंने सेवानिवृत्त कर्मियों को फिर से नौकरी देने का विरोध किया था. अपनी सेवानिवृत्त पर भी मैं इसके पक्ष में नहीं था. 

आखिर सेवानिवृत्त लोग ही नौकरी करते रहेंगे तो नई पीढ़ी क्या करेगी? चाहे वो हमारे बच्चे हों या किसी और के. उन्हे समय पर उचित जॉब मिले. यह हम सबकी, खासकर सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सरकार बेरोजगार युवाओं के बारे में नहीं सोच रही है, बल्कि पकौड़े तलने जैसी बातें कर उसका मजाक बना रहे है. यह कतई ठीक बात नहीं. इससे हमारी हमारे देश की अपनी नींव ही कमजोर हो रही है. 

@ भोपाल से बसंत पाठक 

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