योगी का हंटर भी नहीं रोक सका प्राइवेट स्कूलों की मनमानी -डॉ डी एम मिश्र






योगी सरकार के आदेश भी ''ढाक के तीन पात'' निकले,

अभिभावकों की टूट रही  कमर


डॉ डी एम मिश्र 
वरिष्ठ  कवि व साहित्यकार 





प्राइवेट स्कूलों की मनमानी देश की एक ज्वलंत समस्या है। सरकारों की ओर से ''स्कूल चलो अभियान'' चलाया जाता है, लेकिन स्कूल से जुडी वास्तविक समस्याओं पर कोई ख़ास कार्यवाही नहीं होती। पिछले साल भी योगी सरकार ने इस तरह के आदेश जारी किये थे। लोगों को बड़ी उम्मीद जगी थी कि अब योगी के हंटर के आगे प्राइवेट स्कूलों की मनमानी कतई नहीं चलने पायेगी। लेकिन योगी सरकार के भी आदेश वही ''ढाक के तीन पात'' निकले। आखिर क्या है इसके पीछे की प्रमुख बजह बता रहे हैं वरिष्ठ  कवि व साहित्यकार डॉ डी एम मिश्र -  


प्राइवेट स्कूलों की मनमानी इस समय देश की एक बड़ी ज्वलंत समस्या बन कर उभरी है। हमारे सूबे उत्तरप्रदेश में सरकार की ओर से 2 अप्रैल से 30 अप्रैल तक-''स्कूल चलो अभियान'' मनाया जा रहा है। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने प्रदेश वासियों से सहयोग की अपील की है। मुख्यमंत्री के फरमान का असर प्राइवेट स्कूलों पर कितना पड़ेगा और वे कितना अमल करेंगे यह देखने की बात है, जो अपनी मनमानी के आगे किसी की नहीं सुनते। मुख्यमंत्री के फरमान का असर शायद गाँवों में ज्यादा देखने को मिले, जहाँ गाँव के गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढते हैं। गाँव में अभी भी प्राइवेट स्कूल नहीं के बराबर हैं। क्योंकि अधिकाँश गाँव वालों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि वह इतनी मोटी फीस समय से दे पायें। 


लेकिन इसके इतर शहर में प्राइवेट स्कूलों का धन्धा जोरों पर है। जहाँ लोग खुद किसी तरह गुजारा कर लें लेकिन अपनी छोटी-मोटी नौकरी में भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं। इसलिए उनकी इस मजबूरी का फायदा प्राइवेट स्कूल उठा रहे हैं। अगर यह कहा जाय कि इस समय हमारे देश में प्राइवेट स्कूल खोलने से अच्छा कोई धन्धा नहीं तो अतिश्योक्ति न होगी। यहाँ हम इसके विस्तार में न जाकर उन अभिभावकों की मजबूरी और विडम्बना की बात करते हैं, जिनके बच्चे इन स्कूलों में पढ़ रहे हैं। 


ज्यादातर स्कूलों में हर साल 15 से 20 हजार एडमीशन फीस, इसके अलावा हर महीने नियमित फीस 10 से 15 हजार। ''प्ले ग्रुप'' और नर्सरी से लेकर इंटरमीडिएट तक यही हाल। इतना ही नहीं यह फीस त्रैमासिक या षटमासिक एक साथ जमा करनी पड़ती है। समय से न जमा करने पर प्रतिदिन के आधार पर विलम्ब शुल्क भी देय होता है। फिर निर्धारित दुकान से ही कापी किताब खरीदना। हर साल किताबें बदल देना इनकी आदत है ताकि कोई किसी बच्चें से पुरानी किताब माँग कर न पढ़ सके। 200 पेज मात्र की कुछ किताबों के दाम तो तकरीबन तीन-चार सौ रूपये हैं। यूनीफार्म, जूता, मोजा हर चीज की दुकान निर्घारित। लगभग हर साल यूनीफार्म बदल देने की मजबूरी। अभिभावक इस दबाव को झेलने में कंगाल हो जाता है। 

इसे ऐसे समझिये कि यदि किसी के दो बच्चे किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं तो अप्रैल के महीने में उसे कम से कम एक लाख रूपये का इंतजाम करना होगा। इस मँहगाई में यह सोचने की बात है। इसको लेकर जगह - जगह प्रदर्शन हुए और बात मुख्यमंत्री तक पहुँची तो कुछ नये आदेश जारी हुए। जैसे 7 प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढेगी, यूनीफार्म 5 साल तक नही बदला जायेगा। यूनीफार्म और कापी किताब आदि की दुकान निर्धारित नहीं की जायेगी। जो प्राइवेट स्कूल आदेश का पालन नहीं करेंगे वह दंड के पा़त्र होंगे और उनकी मान्यता भी समाप्त हो सकती है। 


लेकिन मुख्यमंत्री का ध्यान प्राइवेट स्कूलों की बसों की ओर नहीं गया, यह सोचनीय है, जो अपने आप में बहुत बड़ा गोरखधंधा है और नन्हें - मुन्ने बच्चों की जिन्दगी से जुड़ा सवाल है। जब कोई बड़ी दुर्घटना घटती है, तब जरूर लोगों का ध्यान थोड़ी देर के लिए इधर आता है। पीछे के दो-तीन सालों में स्कूल बसों की लापरवाही के कारण अनेक घटनाएँ घटीं और कितने बच्चे हताहत हुए और जान तक गँवा बैठे। 

इस बात पर गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा के सम्बन्ध में कुछ जरूरी दिशा निर्देश जारी किये, जैसे बस का रंग पीला होना चाहिये, बस के आगे और पीछे स्कूल बस लिखा होना चाहिये, यदि बस किसी ऑपरेटर से ली गई है तो उस पर भी स्कूल ड्यूटी लिखा होना चाहिए, खिड़कियों पर ग्रिल और शीशा होना चाहिए, आग बुझाने का इंतजाम बस में होना ज़रूरी है, बस में फर्स्ट एड बॉक्स का होना अनिवार्य हैं। इसके अतिरिक्त स्कूल बस पर स्कूल का नाम, पता और उसका फोन नंबर भी लिखा होना चाहिए, बच्चों को चढ़ाने उतारने के लिये स्कूल का एक सहायक या सहायिका भी होना ज़रूरी है, बस के दरवाज़े ठीक से बंद होने चाहिए और चलती बस के दरवाज़ा लॉक रहने चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा के सम्बन्ध में जारी जरूरी दिशा निर्देशों में कहा कि बस में स्पीड गवर्नर तो हो ही उसकी स्पीड भी 40 किलोमीटर प्रतिघंटा से ज्यादा नहीं होनी चाहिये। यदि कोई स्कूल इन नियमों का उलंधन करता हो तो उसकी प्रशासन और शासन स्तर पर शिकायत करनी चाहिए। जिससें उस पर दण्डात्मक कार्रवाई की जा सके। लेकिन इनके लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी मजाक बन चुका है। ये स्कूल इतने निरंकुश हैं कि इन्हें न्यायालय की अवमानना का डर भी नहीं। 

इन स्कूल वालों ने अपने बचाव का आसान -सा तरीका निकाल लिया है यह कहकर कि बसें स्कूल की हयी नहीं। वो तो प्राइवेट हैं। जिससे स्कूल का कोई लेना - देना नहीं। यहाँ सवाल यह उठता है कि बसें चाहे जिसकी हों अगर उन्हें स्कूल के बच्चों को बैठाना है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना चाहिए। यह सुनिश्चित करवाना उसी स्कूल के प्रबंध तंत्र और प्रिसिपल की जिम्मेदारी है। मगर वह पल्ला झाड़ लेते हैं जबकि उन्हें प्राइवेट बसों की और नकेल कसनी चाहिए। आखिर उनके बच्चों की जिंदगी का सवाल है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। बसें स्कूल की ही हैं या स्कूल से ''टाईअप'' हैं।

अब आपको जमीनी हकीकत बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश का पालन तो दूर की बात। 40 -50 सीट वाली बसों में 70-80 बच्चे भरे जाते हैं। बच्चे खड़े-खड़े स्कूल आते-जाते हैं और सीट नहीं पाते। उनको डराकर रखा जाता है कि अभिभावकों को न बतायें। बसें खचाड़ा है। जो बड़े रूट पर चलने के काबिल नहीं रह जातीं, उन्हीं बसों को प्राइवेट स्कूलों में लगा दिया जाता है। इन बसों की फीस भी मनमानी ली जाती है। ज्यादातर स्कूलों में महीने के पहले सप्ताह में ही बस की फीस देनी होती है। यह फीस अमूमन प्रति छात्र प्रति माह 800 से 1200 है। यानी 35 से 50 रूपये प्रतिदिन। जबकि शहरों में 10 -15 रूपये में टेम्पो मिल जाते है। 

इतना ही नहीं निर्धारित समय पर फीस न देने पर 10 रूपये या इससे अधिक बिलम्ब शुल्क। 20 मई से स्कूल बंद हो जाते हैं और तकरीबन 40 दिन बंद रहते हैं लेकिन इस अवधि की भी पूरी और अग्रिम फीस बस की फीस अभिभावकों को भरनी पड़ती है। तो क्या स्कूल की बंदी के दिनों में बसें खड़ी रहती है? खडी रहती हैं तो कहाँ स्कूल कैम्पस में या अन्यत्र? यदि 40 दिन बसें खड़ी रहती है तो डीजल का पैसा क्यों लेती है? और अन्यत्र चलती हैं तो दोहरी कमाई क्यों करती हैं? लेकिन यह पूछने वाला कोई नहीं।

पिछले साल भी योगी सरकार ने इस तरह के आदेश जारी किये थे। लोगों को बडी उम्मीद जगी थी कि अब योगी के हंटर के आगे प्राइवेट स्कूलों की मनमानी कतई नहीं चलने पायेगी। लेकिन योगी सरकार के भी आदेश वही ''ढाक के तीन पात'' निकले। ऐसा प्रतीत होता है कि चूँकि ज्यादातर प्राइवेट स्कूल किसी विधायक, साँसद अथवा किसी रसूख वाले नेता या पूँजीपति के हैं, इसलिए नियमों का पालन नहीं हो रहा। नियम जनता को दिखाने के लिए उसके संतोष के लिए बना दिये जाते हैं। ऐसे में अभिभावक की कमर टूट रही है, और वह क्या करे उसे कुछ समझ नहीं आता। सिस्टम ही ऐसा बना दिया गया है कि वह केवल और केवल प्राइवेट स्कूलों की मनमानी सहने के लिए एक प्रकार से बाध्य है  


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