रात के उस प्रहर में भी वह अपने दोषियों को सजा दिलवाने थाने पहुंच गई

प्रेरक संस्मरण 


''कम लोग जानते हैं कि 376 नहीं, 375 होता है. इस जानकारी के साथ एक साहस की कहानी, उन दिनों कैंडल मार्च निकालने का फैशन नहीं था, पर उसे इनकी जरूरत भी नहीं थी। अपने अपराधियों को सजा दिलाने वो अकेली ही काफी थी। और हाँ, ऐसे हालात में कभी भी खुद को दोषी मत समझिये, आत्मग्लानि से भर कर गलत कदम नहीं उठाइये. सोचिये आप हम ऐसे हालात में क्या कुछ बेहतर कर सकते हैं, वह करें. यहाँ तक आ जाने के लिए धन्यवाद.. जैसे और कुछ नहीं तो इसे शेयर तो कर ही सकते हैं..''

मल्हारगढ़ में एक दिन सुबह सुबह थाना प्रभारी मल्हारगढ़ ने चर्चा में बताया -" कल रात एक 375 हो गया मैम।" 

नौकरी में शुरू से आदत रही है सुबह सवेरे थाने, राजस्व निरीक्षक, कस्बा पटवारी से चर्चा कर खैरियत ले ली जाए तो दिन भर के घटनाक्रम का अंदाजा और तैयारी हो जाती है।

मुझे धाराऐं बहुत याद नहीं रहतीं, सो मूर्खों की तरह पूछ ही लेती हूं - "क्या हुआ।"

"मैम, कल रात एक युवती बस से मल्हारगढ़ बस स्टैंड पर उतरी थी। आगे जाने वाली बस का इंतज़ार कर रही थी तभी बाईक पर दो लड़के आए।उनमें से एक को वो जानती थी। उन्होंने साथ ले चलने का ऑफर किया तो वो साथ चली गई लेकिन शहर की सीमा से बाहर जाते ही दोनो ने सड़क से बाईक कच्चे में सूनसान स्थान पर उतार ली और वारदात को अंजाम दिया। युवती आधी रात में जैसे तैसे थाने पर रिपोर्ट लिखाने आई थी।उसकी रिपोर्ट पर दोनों लड़कों को उठा लिया है।" 

हे भगवान, टीआई ने जो घटनास्थल बताया वो तो मेरे कवार्टर से 500 मीटर ही आगे है। मतलब रात में घटना के समय और जब वो थाने पर रिपोर्ट लिखाने गई तब मैं घर पर सो रही थी?? मैं आदतन खुद को दोषी समझने लगी।

आधी रात को टूटा शरीर, टूटा भरोसा लेकर किन कदमों से वो ढाई - तीन किलोमीटर चलकर थाने तक किस विश्वास से गई होगी। उसने नहीं सोचा होगा अपनी इज्जत बचाकर चुपचाप घर चली जाए, बात को हमेशा छिपी रहने दे या स्वयं को अपवित्र मानते हुए किसी कुएं, नदी में कूद जाए? 

आत्मग्लानि से उसने खुदकुशी करने जैसा कदम उठाने की नहीं सोची, बात छिपाने की नहीं सोची, बल्कि रात के उस प्रहर में भी अपने दोषियों को सजा दिलवाने थाने पहुंच गई।

ओपन एंड शट केस था। अगले दिन के समाचार पत्रों में दोनों अपराधियों की गिरफ्तारी के समाचार थे ।

हां, उन दिनों कैंडल मार्च निकालने का फैशन नहीं था, पर उसे इनकी जरूरत भी नहीं थी। अपने अपराधियों को सजा दिलाने वो अकेली ही काफी थी।

@ जानकी यादव  

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