अरविन्द जोशी और टीनू जोशी की याद दिलाती 'रेड'




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आज बहुत अरसे के बाद फिल्म देखी रेड.. एक सच्ची घटना पर आधारित इस फिल्म को अजय देवगन मार्का फिल्म कह सकते हैं, लेकिन कोई मारधाड़ और सूं-सां नहीं.. फिल्म ने अपने कसे हुए संवादों और टाईट एडिटिंग के बूते दर्शकों को बांधे रखा है. यूँ भी राजकुमार गुप्ता की फिल्म किसी सत्य घटना पर आधारित डॉक्युमेंट्री सरीखी ही होती हैं. सबसे अलहदा बात है कि इसमें नायक न तो सेना में है, ना पुलिस में और ना ही ऐसे किसी विभाग में जिन पर बनी फिल्मों को देखकर आप पक चुके हो.

पहली बार आयकर छापे पर केन्द्रित सत्य घटना को फिल्म में बखूबी पिरोया गया है. फिल्म 1980 के दशक की है. एक बड़े नेता के घर पर इनकम टेक्स के ऑफिसर बने अजय देवगन छापा मारते हैं और उस नेता के पूरे रसूख को ज़मीदोज़ करके ही वापस आते हैं. संवाद प्रभावी हैं, कोई लटके झटके नहीं, सामान्य परिवेश और लगभग एक ही लोकेशन पर पूरी फिल्म शूट हो गई है. 

इस फिल्म में तीन पात्र आपको याद रहेंगे एक अजय देवगन, दूसरे नेता बने सौरभ शुक्ला और तीसरी दादी बनी पुष्पा जोशी, जिनका प्रारब्ध देखिए कि थियेटर का शौक जवानी के दिनों में था लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझ कर रह गई. 81 साल की उम्र में बेटे ने उनका एक वीडिओ यू ट्यूब पर डाला और वो इतना लोकप्रिय हो गया कि उन्हें इस फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका मिल गई..यानी 81 साल की उम्र में ये उनकी डेब्यू फिल्म है. जबलईपुर के लोग ऐसे क़माल करते हैं.

फिल्म अच्छी है, बांधे हुए रखती है. वज़ह अजय भी हैं और सौरभ शुक्ला भी..डायरेक्टर ने ध्यान रखा कि अलॉर्म घडी से लेकर सभी चीज उसी दौर की हों, जिन पृष्ठभूमि पर फिल्म बनी है.. कुछ बातें ध्यान से देखने पर दिखती हैं.. मसलन अजय देवगन जब किसी को 21 रूपये दे रहे थे, तब 20 रूपये का वही नोट दिखाया गया, जो उस वक़्त था, हालांकि मुझे ऐसा दिखा, जैसे ये नया नोट है.. 

वैसे गुलाबी रंग का 20 का नोट तो इंदिरा जी के वक़्त ही शुरू हुआ था.. इसकी भी कहानी दिलचस्प है. कहा जाता है कि जब उन्होंने 20 रूपये के नोट शुरू करने की मीटिंग बुलाई तो उसके रंग को लेकर संशय था. उस मीटिंग में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव पी डी कास्बेकर भी थे. जब नोट के रंग को लेकर कुछ तय नहीं हो रहा था, तभी इंदिरा जी की नज़र कास्बेकर साहब की जेब में गई, जिसमें एक गुलाबी लिफ़ाफ़ा रखा हुआ था.. दरअसल वो शादी का एक कार्ड था. 

इंदिरा जी को वो रंग पसंद आया और उन्होंने तय कर दिया कि नोट इसी रंग का होगा..बहरहाल, इस फिल्म में भी इंदिरा जी का एक पात्र दिखाया गया है..उनका प्रधानमन्त्री आवास सफदरजंग रोड में दिखाया गया है. और तो बाकी जगह बढ़िया रिसर्च थी डायरेक्टर की, लेकिन जो चूक हुई, वो शायद ये है (मेरे सर्वोच्च संज्ञान के मुताबिक़) कि इंदिरा जी को दाहिने हाथ से लिखते हुए दिखाया गया, जबकि मुझे ऐसा याद है कि बाबूजी मुझे बताते थे कि इंदिरा जी बाएं हाथ से लिखती थीं. (हो सकता है कि मैं ग़लत हूँ) बहरहाल, अच्छी फिल्म है. एक बार देखी जा सकती है और टेक्स की चोरी न करने वाले और ईमानदारी को भाषणों में नहीं, निज़ी जीवन में जीने वाले को ज़रूर मज़ा आएगा...

फिल्म हुल्लड़-मस्ती के शौकीन कुछ युवाओं को शायद अच्छी न लगे, क्यूंकि न तो हीरो हीरोइन में कोई रोमांस है, न कोई पार्टी-शार्टी.. इलियान डिक्रूज़ का होना न होना बराबर है.. वैसे भी ऐसी फिल्मों में हीरोइन नाममात्र को ही होती है... देखिए एक बार मज़ा आयेगा... और हाँ...यदि आप भोपाल के हैं, तो आपको यहाँ के IAS दम्पत्ति अरविन्द जोशी और टीनू जोशी की याद भी आएगी, उनके घर से भी ऐसे ही कुबेर का खज़ाना निकला था, जिसे गिनते-गिनते इनकम टेक्स डिपार्टमेंट को पसीने आ गए थे. 

प्रवीण दुवे   



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