... तब कॉरपेट जैसे बिछ जाते हैं सभी


बॉलकनी में बैठी
चाय की चुस्की लेते हुए
सोच रही थी दुनिया के बारे में
कितनी बेदर्द है
कितनी फरेबी है ये दुनिया

लूट लेती है पल भर के इशारे में
जब आती हैं मुसीबतें
अपने भी नजरें फेर लेते हैं
कोई नहीं आता हालचाल भी पूछने 


जब होती है दौलत बेशुमार
कॉरपेट जैसे बिछ जाते हैं सभी
अच्छे लगते हैं बेतुके सवाल भी पूछने

अपने परायों के इस खेल में

जिंदगी ही कट जाती है हमारी
पर ताउम्र हम कुछ समझ नहीं पाते हैं
अनेक सवाल उठते हैं मन
जवाब उनका मिल नहीं पाता


बस कुछ यूँ ही उलझ कर रह जाते हैं

उलझे हुए हालातों में
सुलझे हुए विचार नहीं आते
और हम कोशिश नहीं करते समझने की


अच्छी बात भी बुरी लगती
खुद में ही सीमटे रहते हैं
कोई समझाए तो कोशिश करते उलझने की


एक सबक सीखा मैंने 
जिंदगी के इन उतार चढ़ावों से
खुद से भरोसा उठने नहीं देना चाहिए


हालातों से लड़े बिना
मुसीबतों से पार नहीं पा सकते
खुद को कभी भी टूटने नहीं देना चाहिए


"सुलक्षणा" के दर्द से
अभी तक अनजान हैं सभी
सच्चाई किसी को नहीं पता ज़माने में


जो झेला है जीवन में
कल्पना भी नहीं कर सकता कोई
पर वो जिक्र नहीं करती अफ़साने में


©® डॉ सुलक्षणा


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