'व्हिस्की में विष्णु बसे..' पालिटिशियन्स की आत्मा में घुसा हुआ है अमरीश पुरी



मायावती ने कहा था कि -"हम सत्ता में आए तो मुलायम होंगे जेल में "। मोदी अलग कुछ कहते हैं, नीतीश कुमार अलग कहते हैं। मायावती अलग कहती हैं। आदित्यनाथ अलग कहते हैं। ओवैसी अलग कहते हैं। और सच्चाई क्या है कि यही मीसा, सोनिया गाँधी के साथ फोटो बनवाती हैं। यही मुलायम और मायावती ने सम्मिलित सरकार चलाई थी उत्तर प्रदेश में। हम कब समझेंगे कि इन्हें 'पालिटिशियन्स' कहा जाता है। ये भी आपस में बहुत प्यार से रहते हैं। सब साथ मिलकर घूमते हैं, खाते हैं। फोन पर बात करते हैं। शादी ब्याह में एक दूसरे के घर भी जाते हैं... और यहाँ लड़ते हैं हम... मरते हैं हम। मेरी ही तरह न जाने कितने लोग अपने मन में 'अमरीश पुरिया' के प्रति नफ़रत पालते हैं। सच तो यह है कि जैसे 'कैरेक्टर्स' के लिए 'कैरेक्टर' मुख्य होता है वैसे ही 'पालिटिशियन्स' के लिए 'पालिटिक्स'। 

बलिया से असित कुमार मिश्र 

आज एक मित्र का मैसेज़ मिला है कि असित भाई समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल जिन्होंने कभी भगवान् श्री राम के बारे में अपशब्द कहे थे, वो अब भाजपा में आ गए हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या लिखूँ! आप ही कुछ लिखिए न!

मुझे याद आ रहा है वह दिन जब भाजपा के प्रदेश स्तर के एक नेता श्री दयाशंकर सिंह जी ने सुश्री मायावती जी के खिलाफ कुछ अपशब्द कहे थे। मायावती जी ने उस मौके का फायदा उठाने के लिए एक रैली आयोजित की जिसमें नारे लगाए गए 'दयाशंकर सिंह की बेटी को पेश करो! पेश करो!!'

ज़ाहिर सी बात है सबका खून खौलेगा ही। दयाशंकर सिंह जी की पत्नी श्रीमती स्वाति सिंह जी ने कहा - 'हाँ बोलिए! कहाँ अपनी बेटी को लेकर आऊँ?'

अब स्थिति बदल गई और एक स्वाति सिंह अचानक मंत्री बन गईं ,बाद में श्री दयाशंकर सिंह जी भी अपने मूल पद पर आ गए।

कहने का मतलब है कि श्री सूत जी की कृपा से सब कुछ ठीक हो गया।
लेकिन मेरा सवाल अब भी वहीं है कि स्वाति सिंह जी द्वारा खाली की गयी अध्यापक की कुर्सी पर कोई दूसरी अध्यापिका आई कि नहीं? अगर नहीं तो कब तक आएगी? कि हम पकौड़े ही... 

खैर! नरेश अग्रवाल और भाजपा के अंर्तसंबंधों पर क्या लिखूँ! दो साल पहले ही लिख चुका हूँ इस पर।
लीजिए - सोचिए! समझिए और तय कीजिए!
जानने और मानने के बीच....

मेरे बचपन के दिनों में कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई का मजा ही कुछ और है। 
बड़े साधारण से थे वे दिन, और बहुत साधारण सी है मेरे बचपन की कहानी।

जब यूरिया खाद के बोरे का सिला हुआ बस्ता होता था। जिस पर सामने का लिखा चमकता था - नाइट्रोजन 46%... 
वही हवाई चप्पलों के मटमैले से फीते। जो दो चार लोहे की कीलों के अवैध संबंधों के दम पर टिके रहते थे। शर्ट के बटन जब अचानक से तलाक दे जाते तो माँ के कलाई की चूड़ियों के बीच रहने वाली सेफ़्टी पिन से शर्ट का 'आकस्मिक विवाह' सम्पन्न हो जाता। डव, ब्रीज और लक्स जैसे 'एकांगी' साबुन हम जैसे 'टैलेंटेड' देखते भी नहीं थे। हम लाईफबाय वाले 'बहुउद्देशीय' साबुन लगाते थे, ताकि मौका पड़ने पर उससे बनियान भी साफ कर ली जाए। लेकिन गुरुर तो दोस्त, तब भी मॉनीटरी वाला ही रहता था। औक़ात तो तब भी इतनी थी कि, जब चाहे जिस लड़के का ज़ुर्म साबित करा कर माट्साहब के हाथों पिटवा दें। लेकिन किस्मत में तब सरकारी स्कूल का छह रुपये मासिक फ़ीस ज़मा करने के लिए बारह बार डाँट सुनना भी लिखा था। गणित के माट्साहब के लिए रोज़ मरने की मासूम सी दुआएँ भी माँगनी लिखी थी। 

लेकिन जैसे ही साइकिल से वो आते दिखते, कसम से देवी-देवताओं पर से भरोसा उठ जाता। दो चोटी बाँध कर आने वाली सभी लड़कियाँ बहुत अच्छी लगती थीं। साइकिल से आने वाली अमीर लड़कियाँ मेरे लेबल की थी ही नहीं, तो उनके बारे में क्या सोचना। उनके सामने तो हम खुद को ईमानदारी से रिजेक्ट मान लेते थे।

'राजा हिन्दुस्तानी' मार्का शर्ट पहनने की वो अधूरी रह गई ख़्वाहिश और हिन्दी की किताब में मिली प्रियंका की वो चिट्ठी। जिसे मेरे दोस्तों ने नाम दिया 'लभ लेटर'। जिससे हम सातवीं कक्षा में ही ग़ालिबन बदनामी के दौर से गुज़रे।

और फिर 'लभ लेटर रखने के जुर्म में' जितनी भी छड़ियाँ इस वज्र देह ने सहीं, उसके गवाह प्रियंका के आँसू भी बने।
लेकिन हमने भी छोड़ा नहीं, और अकेले में प्रियंका से कह ही दिया -" का रेऽ कुत्ती हमके पिटवा के खुश हो गईले नऽ ".....।
सच! बहुत खूबसूरत थे ये दिन।

इन्हीं दिनों गाँव के और लड़कों की तरह हमारे भी फेवरेट हीरो थे मिथुन चक्रवर्ती।हम भी चर्चा करते थे कि कौन 'बरियार' हीरो है? नाम आते सनी देओलवा, जैकी सराफवा और अम्ता बच्चन।यूं हमारे फेवरेट मिथुन दा का रेस में नाम ही न आता। लेकिन हम भी जब तक सबसे मनवा न लेते अपनी इमली किसी को देते नहीं थे। कुछ इमलियों के बदले मेरा हीरो बाक्स आफिस में धूम मचा दे,यह सौदा घाटे का नहीं था।

इसी दौरान कोई फिल्म देखी थी मैंने जिसमें अमरीश पुरी ने मिथुन की माँ को मारा था, बहन के साथ 'गन्दा काम' किया और मिथुन का घर भी जला दिया था। पहली बार मेरी मुट्ठियाँ तनीं थीं। आँखों से आँसू गिरे थे। और अमरीश पुरी मेरा भी 'जानी दुश्मन' बन गया था। तबसे जब भी मैं 'अमरीश पुरिया' को देखता बस एक ही बात दिमाग में आती- बदला।

लेकिन इस बाल मन को झटका तब लगा जब मिथुन की उसी माँ को दूसरे फ़िल्म में 'अमरीश पुरिया' की पत्नी के रूप में देखा। और वो लड़की जिसके साथ 'गन्दा काम' हुआ था, वो अमरीश पुरिया को 'डैडी-डैडी' कह रही थी। दिल पर बहुत चोट लगी कि इसकी नफ़रत को मैं अपने दिल में रखे घूमता हूँ, और ये सब एक ही हैं।लेकिन मैंने अमरीश पुरिया का पीछा नहीं छोड़ा। जहाँ उसके बारे में कुछ छपता मैं ज़रूर पढ़ता था। फिर पता चला कि ये बहुत अच्छा आदमी है बस फ़िल्मों में ही ऐसा काम करता है।और सभी हीरो - हिरोईन 'कैरेक्टर' कहे जाते हैं। सब आपस में बहुत प्यार से रहते हैं। सब साथ मिलकर घूमते हैं। खाते हैं। फोन पर बात करते हैं। शादी-ब्याह में एक दूसरे के घर भी जाते हैं। तब पता चला कि जानने और मानने के बीच कितना बड़ा फ़र्क होता है। मेरी भावनाओं के साथ जो हुआ उसका दोषी सिर्फ मैं था। वो तो अपना काम कर रहे थे... 

रुकिए! कहानी अब शुरू हो रही है। मैं अक्सर देखता हूँ कि मेरे कुछ दोस्त विभिन्न राजनैतिक दलों के लिए दिन भर लड़ते रहते हैं। इंदिरा गाँधी ने लालू यादव को 'मीसा कानून' बना कर ज़ेल भेज दिया तो इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम रख दिया 'मीसा'। सारे कार्यकर्ताओं में जोश की लहर दौड़ गई। लालू जी सत्ता में आ गए।

मायावती ने कहा था कि - "हम सत्ता में आए तो मुलायम होंगे जेल में "। मोदी अलग कुछ कहते हैं नीतीश कुमार अलग कहते हैं। मायावती अलग कहती हैं। आदित्य नाथ अलग कहते हैं। ओवैसी अलग कहते हैं। और सच्चाई क्या है कि यही मीसा सोनिया गाँधी के साथ फोटो बनवाती हैं। यही मुलायम और मायावती ने सम्मिलित सरकार चलाई थी उत्तर प्रदेश में । हम कब समझेंगे कि इन्हें 'पालिटिशियन्स' कहा जाता है। ये भी आपस में बहुत प्यार से रहते हैं। सब साथ मिलकर घूमते हैं, खाते हैं। फोन पर बात करते हैं। शादी ब्याह में एक दूसरे के घर भी जाते हैं... और यहाँ लड़ते हैं हम... मरते हैं हम। मेरी ही तरह न जाने कितने लोग अपने मन में 'अमरीश पुरिया' के प्रति नफ़रत पालते हैं। सच तो यह है कि जैसे 'कैरेक्टर्स' के लिए 'कैरेक्टर' मुख्य होता है वैसे ही 'पालिटिशियन्स' के लिए 'पालिटिक्स'। 

बहुत सोचने की बात है कि आज़ादी के बाद जो आम चुनाव हुए उसमें जो मुद्दा था - गरीबी भ्रष्टाचार और विकास। पैंसठ सालों बाद पार्टियाँ बदलती गई नेता बदलते गए लेकिन मुद्दा आज भी वही है। जबकि भारत के किसी भी एक पंचवर्षीय योजना को ठीक से कार्यान्वित कर दिया जाए तो लगभग सब ठीक हो जाएगा। लेकिन फ़िल्म के लिए जैसे 'अमरीश पुरिया' ज़रूरी है वैसे ही पार्टियों के लिए गरीबी भ्रष्टाचार और पिछड़ापन। अमरीश पुरिया ही नहीं रहेगा तो कैसी फिल्म? और ये मुद्दे ही नहीं रहे तो कहाँ जाएगा 'पालिटिशियन्स'....आज भी हमारे भावनाओं के साथ खेल होता है। लेकिन हम दोष 'अमरीश पुरिया' को देते हैं। यह भूल कर कि जानने और मानने के बीच बहुत फर्क होता है। 


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