सूखी टहनियों पर खिलता है, महकता है गुड़हल और देता है सुर्ख होकर 'जिंदगी की आस का अहसास'





प्रेरक 


रूखे-सूखे लोगों की तरह जंजाल बनी हैं टहनियां। इस जटिल समाज का आईना दिखता है। कुछ सूखी हैं, कुछ दिखती तो सूखी हुई हैं, पर तोड़ने की कोशिश करो तो उनमें अभी भी जान होती है। टूटती नहीं हैं। उनके भीतर हरापन रहता है। वो मरने नहीं देती हैं। उन सूखी टहनियों पर ये गुड़हल खिलता है। महकता है और सुर्ख होकर जिंदगी की आस का अहसास देता है।

एक सड़क किनारे होकर भी वो अपना मुकाम नहीं बताता। बस यही कहता है 'चलो कि अभी बहुत कुछ बाकी है।'

कैलाश वानखेड़े, इंदौर 

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