ग़रीब की रोटी के बदले



समर! तू हो कहीं पर भी
मुझे अच्छा नहीं लगता
सफेद गुलाब से बहता
लहू अच्छा नहीं लगता।
मर के फिर देखता है कौन
तेरी दुनिया को
मेरे आशिक तेरी आँखों में
लहू अच्छा नहीं लगता।
जमाने भर में बहसें होंगी
और रुसवाइयां भी तो
ग़रीब की रोटी के बदले
लहू अच्छा नहीं लगता।

@ जूही शुक्ला, इलाहाबाद 

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News Digital India 18

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