आज फिर बरबस खिले हैं फूल सरसों के

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आज फिर बरबस खिले हैं फूल सरसों के

बाग में थी घास,
किस्में नागफनियों की कई
ले बसंती फूल यह
सरसों कहाँ से आ गयी
फिर जगे, सोये हुए सब स्वप्न बरसों के.

जब कि गेंदा तक
गिराने लग गया था फूल
तब इन्हें मौसम लगा
अपने लिए अनुकूल
लगे छूने मन अरथ खुरदरे परसों के.

हम बहुत बीमार थे
पर अब नहीं हैं
हम किसी का प्यार थे
पर कब नहीं हैं
हम नुमाइश मेेें नहीं मुहताज दरसों के. 

Image may contain: डॉ.धनञ्जय सिंह      @ धनञ्जय सिंह , गाजियाबाद



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