क्यों सूख रहे हैं गाँव में कुएं


''वर्तमान में सरकारें सिंचित जमीन का रकबा बढ़ाने पर खूब जोर दे रही हैं. अच्छी बात है, लेकिन किसी का भी ध्यान जमीन के भीतर बहुत तेजी से घटते जलस्तर पर नहीं है.''
                                                                         @ प्रमेंन्द्र ठाकुर इंदौर 

मार्च 2016 में, मैं अपने पिताजी के के वार्षिक श्राद्ध के लिए गांव गया तो पता चला कि गाँव के कुयें का पानी खत्म हो गया, जबकि गाँव के मेरे बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भी इस कुयें के पानी को गर्मियों के मौसम में भी खत्म होते नहीं देखा और ना ही उन्होंने अपने बुजुर्गो से कभी इस कुयें का पानी खत्म होने की बात सुनी थी.

तो फिर कुंआ सूखा क्यों? पता चला कि गांव के आसपास खेतों में सबने सिंचाई के लिए बोरिंग करा लिये हैं जिससे धीरे-धीरे जमीन के भीतर पानी का स्तर कम होता चला गया और उसकी परिणीति यह हुयी कि गांव में और गांव के आसपास जमीन के भीतर पानी का स्तर सैंकड़ों फिट नीचे जा चुका है और यह जलस्तर धीरे-धीरे और नीचे जाना ही है.

रही बात नदियों की तो नदियों का हम जिस तरह से शोषण कर रहे हैं, नदियां भी सूखती ही जा रही हैं, लेकिन हम अपनी करतूतों से बाज नहीं आ रहे हैं. ऐसे में हम कितना भी खेती की जमीन का सिंचित रकबा बढ़ा दें, लेकिन उस सिंचित जमीन में खेती करने के लिए पानी कहां से लाओगे? क्या कोई भी इस बारे में सोच रहा है? उत्तर भी बड़ा स्पष्ट है, नहीं.

एक बार सोच कर जरूर देखियेगा कि हम आने वाली पीढी के लिए क्या छोड़ कर जा रहे हैं. अभी भी समय है चेतन्य जाग्रत हो जाइये और पेड-पौधे लगाइये, रैन वाटर हारवेस्टिंग पर जोर दीजिये, क्योंकि अगर आज हमने प्रकृति की चिंता नहीं की, तो भविष्य बड़ा ही भयावह है.
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