जिस आदमी पर त्रिपुरा में बवाल हो रहा है, फांसी से पहले उसकी ही किताब पढ़ रहे थे भगत सिंह




''एक मिनट रुकिए. अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है. 
वह दुसरे क्रांतिकारी लेनिन थे, 101 साल पुरानी रूसी क्रांति के हीरो लेनिन, 
जिन्हें लेकर त्रिपुरा में बवाल शुरू हो गया है. उनकी मूर्ति तोड़ दी गई है.''

Lenin: Architect of Russian Revolution, one of the greatest revolutionaries of all time at the center of a political dispute in Tripura

लेनिन. दुनिया की सबसे महान क्रांतियों में से एक के नेता. लैटिन अमेरिका के कई देशों पर रूसी क्रांति का प्रभाव था. जब रूस में क्रांति सफल रही, तब भारत के क्रांतिकारियों में भी आजादी की उम्मीद मजबूत हुई थी.

           दशकों बीत जाते हैं और कुछ भी नहीं होता. और कभी ऐसा भी होता कि हफ्तों में दशक गुजर                        जाते हैं.   – व्लादीमिर लेनिन
   / thelallantopswati@gmail.com  

22 मार्च, 1931. लाहौर. इस रात यहां एक धूल भरी आंधी आई थी. सुबह होते-होते, आंधी थमी. लाहौल सेंट्रल जेल में थोड़ी अफरा-तफरी थी. जेल अधिकारी सुपरिडेंटेंट पी डी चोपड़ा के कमरे में जमा थे. कुछ खास बात हो रही थी वहां. एकदम दबी-सधी आवाज में. इसी जेल में बंद थे भगत सिंह. और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु. अगले दिन भगत और उनके साथियों को फांसी दी जानी थी. सुबह-सुबह. मगर अब प्लानिंग बदल दी गई थी. चुपके-चुपके तय किया गया कि 23 मार्च की ही शाम को फांसी दे दी जाए. ऐसा होता नहीं था. शाम को फांसी नहीं दी जाती है. जेल वॉर्डन छत्तर सिंह ने ये खबर तीनों क्रांतिकारियों को पहुंचा दी. छत्तर दुखी थे. उन्होंने भगत से कहा- भगवान का नाम जप लो. मगर भगत व्यस्त थे. शाम को उन्हें फांसी होने वाली थी. खत्म होने से पहले वो उस किताब को खत्म कर लेना चाहते थे. वो किताब रूस के महान क्रांतिकारी लेनिन पर थी. कहते हैं कि उस शाम को जब फांसी के तख्ते तक भगत को ले जाने के लिए अधिकारी आए, तो भगत ने कहा:
          एक मिनट रुकिए. अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है.
भगत सिंह लेनिन की उसी किताब का जिक्र कर रहे थे. चंद मिनटों में वो उठे. किताब का वो पन्ना मोड़ा. उसे वहीं रखा. और चल दिए.

भगत सिंह ने अपने लेखों में भी लेनिन और रूसी क्रांति का जिक्र किया है.

त्रिपुरा में बीजेपी जीती, लेनिन का सिर तोड़ दिया गया 
त्रिपुरा में चुनाव हुआ. राजनीति के भगवा रंग ने लाल रंग को हरा दिया. दक्षिणपंथी बीजेपी जीत गई. लेफ्ट हार गया. जीत के जश्न में कुछ लोगों को लेनिन की एक मूर्ति याद आई. उन्होंने मूर्ति का सिर तोड़ा. माने, मूर्ति का ‘बिहेडीकरण’. और उस सिर से फुटबॉल खेला. त्रिपुरा में हिंसा शुरू हो गई. विपक्ष ने बीजेपी पर उंगली उठाई है. बीजेपी ने उंगली उनके ऊपर ही मोड़ दी है. उसका कहना है कि बीजेपी के वेश में लेफ्ट के लोगों ने लेनिन की मूर्ति को तोड़ा. इस सबके बीच ट्रेंड हो गए लेनिन. रूस ने भी नहीं सोचा होगा कि हजारों किलोमीटर दूर भारत का एक सुदूर कोना लेनिन को यूं ट्रेंड करा सकता है. ये खबर उनके लिए है, जो लेनिन को नहीं जानते. और उनके लिए भी, जो लेनिन को गलत जानते हैं या अधूरा जानते हैं.

लेनिन. दुनिया की सबसे महान क्रांतियों में से एक के नेता.

95 साल हुए लेनिन की मौत को, लाश अब भी संभाल कर रखी है
जनवरी के महीने की 21वीं तारीख थी. साल था 1924. इसी दिन मरे थे वो. इस बात को 95 साल होने को आए.  मॉस्को शहर के बीचो-बीच एक जगह है. रेड स्क्वॉयर. इतने सालों से इस इंसान की लाश यहां रखी है. ऊपर जो दशकों और हफ्तों वाली बात लिखी है, वो इसी इंसान ने कही थी. इस दुनिया में गिनती की ही बड़ी क्रांतियां हुई हैं. उनमें से एक महान क्रांति रूस में हुई. ये शख्स उस क्रांति का नायक है. सोवियत संघ के महान नेता लेनिन. रूस को लगता है कि लेनिन को दफना दिया, तो उसके इतिहास का सबसे सजीला हिस्सा खत्म हो जाएगा. उसी इतिहास को जिंदा रखने की उम्मीद में लेनिन का शव इतने सालों से वहां रखा हुआ है. जैसे, मिस्र के किसी फराओ का शव पिरामि़ड में रखा हुआ हो. पूरी हिफाजत से.

रूस ने लेनिन को बहुत जतन से संभाला हुआ है. वो रूस के सबसे बड़े ब्रैंड हैं. 
बल्कि वो कम्युनिस्ट आंदोलनों के ही सबसे बड़े ब्रैंड हैं.

जैसी मां गंगा, वैसी ही मां वोल्गा… और उसके किनारे पर बसा शहर 
रूस का एक शहर. सिमब्रिस्क. वोल्गा नदी के किनारे ठहरा हुआ सा. मदर वोल्गा. यूरोप की सबसे लंबी नदी. जैसी हमारी गंगा, वैसे रूसियों की वोल्गा. मां जैसी. इस शहर में एक जोड़ा था. इल्या उलयानोव. और उनकी बीवी, मारिया अलेक्जेंड्रोनोवा ब्लांक. दो बच्चे थे इनके. 22 अप्रैल, 1870. इसी दिन, पैदा हुए व्लादीमिर इलिच उल्यानोव. इल्या और मारिया की तीसरी संतान. मां और बाप, दोनों का परिवार भरा-पूरा. इल्या स्कूल मास्टर थे. लोग उनको जानते थे. मारिया यहूदी थीं. उनके पिता डॉक्टर थे. वो भी रूसी साहित्य की अच्छी जानकार थीं. मां-बाप का पढ़ा लिखा बैकग्राउंड ही था कि उन्होंने अपने बच्चों को खूब पढ़ाया. इसी व्लादीमिर ने आगे चलकर अपना एक और नाम रखा. लेनिन. और इसी नाम से वो दुनिया में इतिहास बन गए.

2017 में रूसी क्रांति को 100 साल पूरे हो गए.

फांसी चढ़ा दिए गए थे लेनिन के बड़े भाई
लेनिन पढ़ाई में अच्छे थे. कानून की पढ़ाई शुरू की. यूनिवर्सिटी पहुंचे, तो क्रांति मिजाज होने का चस्का लगा. ये शायद बड़े भाई अलेक्जेंडर साचा का असर था. साचा को सेंट पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडल मिला था. बाद में वो उस समय रूस के शासक रहे जार अलेक्जेंडर तृतीय के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ गए. कई रैलियां आयोजित कीं. विरोध प्रदर्शन करवाए. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. फिर 25 अप्रैल, 1887 को उन्हें फांसी दे दी गई. साचा पर जार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप था. साचा की हत्या का लेनिन पर बहुत असर हुआ. इसी असर का असर था कि लेनिन एक क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गए.
देश निकाला मिला, सर्बिया भेज दिए गए
लेनिन के खयालातों की वजह से उन्हें कॉलेज से निकाल बाहर कर दिया गया. रेग्युलर कोर्स छोड़ना पड़ा. बतौर बाहरी छात्र उन्होंने जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई खत्म की. फिर सेंट पीटर्सबर्ग चले आए. वो ही शहर, जिसे उनके भाई ने अपनाया था. यहीं पर लेनिन ने मार्क्स को पढ़ा. वो दौर राजशाही के विरोध का दौर था. लेनिन जैसे सैकड़ों युवा जारशाही के खिलाफ थे. उन्हें गिरफ्तार करके सर्बिया भेज दिया गया. इसे देश निकाला समझ लीजिए. यहीं एक्जाइल के दौरान लेनिन को मुहब्बत हुई. नादेज्ह्दा क्रुपस्काया से. दोनों ने शादी कर ली. ये 1898 का साल था.

भीड़ को संबोधित करते लेनिन…

पार्टी का बंटवारा: मेनशेविक और बोल्शेविक
सन् 1900. अगले सौ सालों की शुरुआत होने को थी. लेनिन को वापस घर लौटने की इजाजत मिली. मगर वो यूरोप घूमते रहे. अखबार निकाला. नाम रखा- इसक्रा. रूसी में इसका मतलब होगा- रोशनी. या फिर, चिंगारी. फिर रशियन सोशल डेमोक्रैटिक लेबर पार्टी में भी शामिल हो गए. 1903 में पार्टी के एक दूसरे नेता- जूलियस मार्तोव से उनकी बहस हो गई. लेनिन चाहते थे कि जब राजशाही जाए, तो उसकी जगह एक सख्त नियम आए. जहां ताकत सरकार के हाथों में हो. मार्तोव का कहना था कि ये ताकत आम लोगों को मिले. इतनी बड़ी हो गई ये बहस कि पार्टी के दो टुकड़े हो गए. जो लोग मार्तोव से सहमत थे, वो मेनशेविक कहलाए. माने अल्पसंख्यक. जो लोग लेनिन से सहमत थे, वो बोल्शेविक कहलाए. यानी, बहुसंख्यक.


लेनिन ने कहा: ये वर्ल्ड वॉर लालच की लड़ाई है
फिर पहला वर्ल्ड वॉर हुआ. 1914 में. इस दौरान भी लेनिन यूरोप के अलग-अलग देशों में घूम रहे थे. उस वक्त दुनिया में जो वामपंथी विचारधारा की पार्टियां थीं, उनको समझ नहीं आ रहा था कि इस युद्ध को सपोर्ट करना चाहिए कि नहीं. लेनिन और उनकी बोल्शेविक पार्टी, ये उन गिने-चुने लेफ्ट ग्रुप्स में थी जो इस जंग का विरोध कर रहे थे. उनका कहना था कि ये जंग मार्क्सवादी आदर्शों के लिए नहीं लड़ी जा रही है. इसका मकसद है पूंजीवाद. उसे और बढ़ाना. और फैलाना. कि दुनिया के बड़े और मजबूत देश अपने से गरीब देशों पर जुल्म कर रहे हैं. उन्हें इस्तेमाल कर और अमीर बनते जा रहे हैं. और ये जंग इसी लालच का नतीजा है. इसीलिए लड़ी जा रही है कि कौन इस लूट में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पा जाए.
और लेनिन के खिलाफ अफवाहें फैलने लगीं
एक ओर रूस जर्मनी से लड़ रहा था. दूसरी ओर लेनिन की जर्मनी से बहुत दोस्ती थी. इसी वजह से 1917 आते-आते उनके बारे में अफवाहें जोर पकड़ने लगीं. कि उन्होंने जर्मनी से पैसे खाए हैं. और इसीलिए वो रूसी सत्ता को कमजोर करने में लगे हैं. रूस जंग लड़ रहा था. बहुत सारे रूसी इस जंग में मारे गए थे. लेनिन के खिलाफ अफवाहें तेज होने लगीं. लेनिन भागकर फिनलैंड चले गए.


और फिर मार्च में हुई फरवरी क्रांति
फिर आई फरवरी क्रांति. 8 मार्च, 1917 को. मार्च में हुई इस क्रांति को फरवरी क्रांति कहने की वजह है. रूस में उस समय जूलियन कैलेंडर चलता था. इसके मुताबिक तब फरवरी ही थी. सेंट पीटर्सबर्ग में लूटपाट शुरू हो गई. विश्व युद्ध के कारण खाने-पीने की चीजों की किल्लत हो गई थी. वजह बस इतनी नहीं थी. इस जंग ने रूसी अर्थव्यवस्था को बहुत दरिद्र बना दिया था. जार निकोलस द्वितीय गद्दी पर थे. उन्हें नहीं लगा था कि उनकी सत्ता को कोई खतरा है. मगर कुछ ही दिनों में विरोध बढ़ता गया. भीड़ ‘रोटी-रोटी’ के नारे लगाती. राजशाही के खिलाफ भी नारे लगने लगे. भीड़ ने जंग के खिलाफ भी नारेबाजी करना शुरू कर दिया. इससे पहले 1905 में भी ऐसी एक क्रांति हो चुकी थी. जार निकोलस की सत्ता बची रही थी तब भी. मगर फरवरी क्रांति में उनके खिलाफ विरोध बढ़ता जा रहा था. जार ने सेना से कहा कि विरोध दबाओ. सेना के एक बड़े हिस्से ने इनकार कर दिया. बल्कि उल्टा विद्रोहियों से जा मिले. 15 मार्च तक हालत इतनी बिगड़ी कि जार निकोलस के हाथ से चीजें निकल गईं. जार ने गद्दी अपने भाई को देने की पेशकश की. भाई ने गद्दी लेने से इनकार कर दिया.
जार गया, सरकार आई
इस क्रांति का असर हुआ. कामचलाऊ सरकार बनी रूस में. इस सरकार ने रूस को वर्ल्ड वॉर से अलग नहीं किया. इस फैसले की वजह से क्रांति की जमीन बनी रही. जर्मनी चाहता था कि किसी भी तरह से रूस इस जंग से बाहर हो जाए. इसीलिए उसने लेनिन को मदद दी. अप्रैल 1917 में लेनिन रूस लौट आए. लेनिन को लगा कि जो क्रांति हुई है, वो क्रांति नहीं है. यानी, असली क्रांति अभी हुई नहीं.


और फिर हुई वो महान क्रांति…
अक्टूबर 1917 में लेनिन और ट्रोटस्की के नेतृत्व में एक और क्रांति हुई. केरेंस्की सरकार के खिलाफ. इसी को अक्टूबर क्रांति कहते हैं. लोग सड़कों पर उतर आए. लोग, मतलब आम लोग. सेना ने जनता पर हमला करने से इनकार कर दिया. राजा के सैनिक मार्क्सिस्ट नारे लिखे बैनर लिए नजर आते. उन्हें याद था. कि जार ने उन्हें जानलेवा सर्दी में जंग लड़ने भेजा. ऐसी जंग, जिससे आम लोगों का कोई भला नहीं होना था. सैनिक जान गए थे. कि राजशाही उन्हें बस चूसती रहेगी. मगर जार ने हार नहीं मानी. निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई गईं. इससे क्रांति और भड़की. मजदूर, सैनिक, कामगर, किसान, छात्र सब एकजुट हो गए. ये सच में जनता की क्रांति थी. तभी तो ये कामयाब हुई. लेनिन ने ऐलान किया. कि रूस अब कम्युनिस्ट देश है. नवंबर आते-आते लेनिन रूस के नेता चुन लिए गए. फरवरी 1918 में लेनिन ने जर्मनी के साथ समझौता किया. रूस को प्रथम विश्व युद्ध से अलग कर दिया. रूस की काफी जमीन उसके हाथ से निकल गई. मगर लेनिन का कहना था कि रूस अगर जंग में बना रहा, तो उसे ये और ज्यादा महंगा पड़ेगा. उसका युद्ध से निकलना बहुत जरूरी है.
लेनिन का कहना था:
           हमारी सरकार मानती है कि इस युद्ध का जारी रहना इंसानियत के खिलाफ एक बड़ा अपराध है. अमीर और मजबूत देश इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि उन्होंने जिन कमजोर देशों को जीता है, उसका बंटवारा कैसे करें. इसीलिए हमारी सरकार तत्काल खुद को इस युद्ध से अलग करने का ऐलान करती है.


क्रांति के बाद रूस में शुरू हुआ सिविल वॉर
रूस और जर्मनी के बीच हुए इस समझौते ने ब्रिटेन और फ्रांस का पारा गर्म कर दिया था. यूरोप के इन सबसे बड़े देशों को अब वामपंथ का डर सालने लगा. उनको लगने लगा कि अगर रूस में कम्युनिस्ट आंदोलन हो सकता है, तो ये उनके अपने देश में भी हो सकता है. ये देश अब जार का समर्थन करने वाले ‘वाइट रशियन्स’ को सपोर्ट करने लगे. उन्हें उम्मीद थी कि शायद राजशाही वापस लौट आए. मगर ऐसा नहीं हुआ. हालांकि लेनिन की राह भी आसान नहीं थी. रूस में एक तरह का गृह युद्ध शुरू हो गया. बोल्शेविक पूरे देश में क्रांति बचाने को लड़ रहे थे. बोल्शेविक सेना को नया नाम मिला. रेड आर्मी. लेनिन ने कहा कि सेना के जवानों को ज्यादा से ज्यादा खाना मिले. उस समय रूस भुखमरी से जूझ रहा था. लोग भूखों मर रहे थे. खाने के लालच में बड़ी तादाद में लोग रेड आर्मी के साथ जुड़ने लगे. लेनिन की इस रणनीति ने उन्हें बहुत मदद दी. चार साल लगे, मगर रेड आर्मी ने सिविल वॉर जीत लिया.

1917 की इस तस्वीर में लोग बोल्शेविक परेड में हिस्सा लेते हुए नजर आ रहे हैं.

लेनिन ने बनाई थी दुनिया की पहली मार्क्सिस्ट सरकार
लेनिन इस दुनिया की सबसे महान क्रांतियों में से एक ‘अक्टूबर क्रांति’ के नेता थे. महान क्रांतिकारी थे. रूसी क्रांति के बाद दुनिया में पहली मार्क्सिस्ट सरकार बनी. सरकार ने कहा- देश जनता के लिए है. सिस्टम जनता के लिए है. कि संसाधनों पर सबका हक है. कि कोई भी इंसान क्यों रोटी और कपड़े जैसी बुनियादी चीजों के लिए तरसे. सबको शिक्षा मिले. ऐसा न हो कि पैसे की कमी में गरीब का इलाज न हो पाए. लेनिन और इस विचारधारा ने दुनिया में कई क्रांतियों को प्रभावित किया. कई लोगों को सिखाया. सीखने वालों में एक नाम भगत सिंह का भी है. भगत तो बस एक नाम हैं. रूसी क्रांति ने दुनिया के अनगिनत लोगों पर असर डाला. ऐसा नहीं कि फरवरी क्रांति के बाद रूस में बोल्शेविक के अलावा और क्रांतिकारी संगठन नहीं थे. कई थे. मगर उनमें सबसे असरदार निकले बोल्शेविक. इसके पीछे लेनिन का नेतृत्व था. इस कम्युनिस्ट आंदोलन ने पश्चिमी देशों को बहुत डराया. 1991 में सोवियत संघ के टूटने तक उन्हें इसका खौफ सताता रहा. कि एक दिन कम्युनिस्ट विचारधारा पूंजीवाद को हरा देगी. और इस खौफ को शक्ल देने में जिस इंसान का सबसे बड़ा हाथ था, वो बेशक लेनिन ही थे.
साभार : thelallantop.com




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