तलाक की मिठाई

लघुकथा


"अंकलजी नमस्ते, आंटी कहाँ हैं?"
मैने नजर उठाकर देखा, तो कालोनी के दुबे जी की लड़की सोनल खड़ी थी। सोनल की शादी दो वर्ष पूर्व ही हुई थी, किन्तु ससुराल वालों से किसी बात पर हुई खटपट के कारण वह शादी के एक माह के भीतर मायके लौट आई थी।
"आंटी जी तो नहीं हैं, वे बाजार गई हैं।"
"ठीक है अंकल, ये मिठाई रख लीजिये।"
"मिठाई... किस खुशी में..." मैंने पूछा।
सोनल ने कुछ शर्माते और मुस्कराते हुए कहा -" अंकल, वो मुझे तलाक मिल गया है ना, उसी की मिठाई है।"
सोनल चली गई, लेकिन मैं मिठाई का पैकिट हाथ में लिये सोच रहा था कि क्या जमाना इतनी तेजी से बदल रहा है? विवाह की मिठाई तो खाई थी, अब तलाक की मिठाई...?
क्या आधुनिकता के मायने भी बदल रहे हैं? 


डॉ. प्रदीप शशांक, जबलपुर


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