तुम्हारी मेरी शाम




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सुनो....!
तुम्हारी मेरी
शाम अब उम्रदराज़
हो चली...!
अब अल्हड़पन
और बचपना कम होने लगा है 
सुनो हमारा बचपन
उम्रदराज़ हो चला..!
बाज़ार में जाते वह
नई चीज़ो को देख
ठिठकना.सुनो अब
मन नही होता नई
चीज़ो को देखना
शायद हमारी ख्वाहिशें
उम्रदराज़ हो चली..!
वह लड़ना झगड़ना
वह इतराना बेवज़हसुनो हमारे वह सारे भाव
शायद उम्रदराज़ हो चले..!
सुनो तुम्हारी मेरी शाम
अब उम्रदराज़ हो चली...!

                       @ सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ 


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1 comments:

  1. बहुत मर्मस्पर्शी लेखन !!!!

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