खुशियां मिलती हैं जहाँ से


ख़ुदा के सिवा किसी की परवाह नहीं,
एक तेरे सिवा मुझे किसी की चाह नहीं।

तू आजमाता रहा मुझे कदम कदम पर,
फिर भी तेरे दिल में मिली पनाह नहीं।

मैं वासना को ही मोहब्बत समझती रही,
मोहब्बत की थी, किया कोई गुनाह नहीं।

मैं पूजती रही तुम्हें मानकर ख़ुदा अपना,
पर तू समझा मुझसा कोई लापरवाह नहीं।

बदनसीब था तू जो जिस्म पाकर खुश था,
भुला तू पाक रूह से बड़ी कोई दरगाह नहीं।

मेरी बेबसी को बस मेरा ख़ुदा ही जानता है,
बद्दुआ कैसे देती, भूली चेहरा निगाह नहीं।

तेरे दिए जख्मों को सहलाते हुए जी रही हूँ,
तू आएगा जरूर रख आस किया निकाह नहीं।

बैठी है उस मज़ार पर जाकर "सुलक्षणा" आज,
खुशियां मिलती हैं जहाँ से, मिलती आह नहीं।


@ डॉ. सुलक्षणा अहलावत 

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