विकास का आइना स्वास्थ्य विभाग खुद डायलेसिस पर



''मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर हैं. इसकी कई तस्वीरें सामने आती रही हैं, लेकिन सरकार इन बुनियादी सुविधाओं को लेकर कभी भी ज़िम्मेदार नहीं दिखी. इसी पर विशेष रिपोर्ट पेश कर रहे हैं भोपाल से डॉक्टर अरविन्द जैन.'' 

ब्यावरा के सिविल अस्पताल में गर्भवती महिला पूजा बाई इलाज को आयी तो उसे अस्पताल के बाहर, ड्रिप पेड़ से लटका कर इलाज किया गया. बाद में मामला उठा तो सबने एक दुसरे पर ठेल कर पल्ला झाड़ लिया सरकार भी कुछ न कर सकी. 

लौका, जोंक या जिसे अंग्रेजी में लीच कहते हैं, उसका एक स्वाभाव है कि वह जिस जल या पानी में पैदा होती है वह उसी जल में ही जीवित रहती है. उसका स्थान या जल बदलने से उसका जीवन खतरे में पड़ जाता है. इसी प्रकार यदि बहते हुए जल को रोक दिया जाता है या तालाब का पानी बहुत दिनों के बाद सड़ांध पैदा कर देता है और उसका उपयोग करने वाले को कुछ नहीं होता है कारण वह उसका अभ्यस्त हो जाता है. 

स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, महिला बाल विकास आदि सरकार का आइना होते हैं, जिनके द्वारा सरकार की उन्नति या अवनति जानी जाती है. सरकार स्व-मुख से अपनी मुक्त कंठ से प्रशंसा करती है, पर जब कोई आइना दिखाता है तब सरकार अपना चेहरा साफ़ न करके आइना को साफ़ करती है. वैसे मध्यप्रदेश सरकार को मन पसंद सरकार कहना सुहावना लगता है. कारण इस राज्य में सब कुछ भगवान् की मर्ज़ी से चलता है और भगवान् हमारे भोले भंडारी कहे जाते हैं, पर वे वैसे हैं नहीं. 

स्वास्थ्य विभाग सरकार का सबसे खर्चीला विभाग माना जाता है. इसमें आमदनी तो नहीं है, पर व्यय बहुत होता है. जैसे शिक्षा विभाग, जेल विभाग, पुलिस विभाग, आमदनी वाले विभाग होते हैं ट्रांसपोर्ट, खदान, सिंचाई, लोक निर्माण विभाग. खैर सरकार तो खर्च कैसा, कहाँ होता है, किसी को नहीं मालूम और न पता चलता है.

स्वास्थ्य विभाग के एक अंग में जिसमें बच्चों और महिलाओं के उत्थान की योजनाओं में मनपसंद सरकार में चार हजार करोड़ रूपए खर्च होने के बाबजूद स्थिति कितनी दयनीय और चिंतनीय है, विचार करने योग्य है. शिशु मृत्यु दर 62 प्रति हजार है. सबसे अधिक देश में नवजात शिशु मृत्यु दर 34 है, कम वजनी बच्चों के मामले में देश में नीचे से पांचवे स्थान पर है. पूर्ण टीकाकरण में भी हम सबसे निचले स्तर पर हैं, हमारा पूर्ती का स्तर 74 .78 % है. संस्थागत प्रसव में हम नीचे से चौथे स्थान पर हैं.

यदि हम बजट और अधोसंरचना पर ध्यान दें, तो महिला और बाल विकास की योजनाओं पर हर साल चार हजार करोड़ से अधिक खर्च किया जाता है, जिसमें 443 बाल विकास परियोजनाएं, 80160 आंगनवाड़ी और 12070 उप आंगनवाड़ी संचालित हैं. इसमें आधा पैसा केंद्र सरकार देती है, जिसमें 6 माह से 6 साल तक के बच्चे, गर्भवती महिलाओं और माताओं को इसके तहत पोषण आहार दिया जाता है. मध्य प्रदेश में वर्ष 1990 से 55 %बच्चे कम वजन के हैं और कुल मौतों में 55 % मौतें कुपोषण के कारण होती हैं. 



कुपोषण के कारण बच्चों का शरीर का विकास और मानसिक विकास नहीं हो पाता. पोषण आहार पर्याप्त न मिलने से कुपोषण की समस्या जन्म लेती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाती और बीमारियां मृत्यु का कारण बनती हैं. इसमें भी मजेदार बात यह है कि हमारे प्रदेश में प्रसव पर सबसे कम मात्र 1387 रूपए राशि खर्च की जाती है. 

हम आंकड़ों में न जाकर इस बात पर विचार करें कि इसके पीछे बुनियादी समस्या क्या है, क्या वास्तव में केंद्र से पैसा नहीं आता? इतना बड़ा बुनियादी संरचना होते हुए हम क्यों इस प्रकार दुर्दशाग्रस्त हैं? हज़ारों की संख्या में आँगनवड़ियां सही ढंग से काम नहीं करती हैं? वहां पहुँचने वाला पोषण आहार और सामग्रियां समुचित ढंग से नहीं पहुँच रही या नहीं बंट रही या कही बंदरबाट तो नहीं हो रही. या घटिया स्तर की सामग्री प्रदाय की जा रही है. या सरकार इस तरीके से काम कर परिवार नियोजन का लक्ष्य प्राप्त करना चाहती है या आबादी नियंत्रण करना चाहती है या रुग्ण संतानें देश के विकास में काम के योग्य न रहें.

एक बार भूतपूर्व मुख्य मंत्री से यह पूछा गया कि मध्य प्रदेश के नवजवान सेना में भर्ती क्यों नहीं होते, तो उन्होंने जबाव दिया कि ''जवान भर्ती होते हैं, कमजोर नहीं होते हैं''. आज उस बात का अहसास हो रहा है कि हमारे प्रदेश के राजनेताओं का इसमें बहुत बड़ा योगदान है. इसके पीछे एक कारण है कि हमारे कर्मचारी भी इसमें पूर्णत: दोषी हैं और राजनेता, राजनेता का हस्तक्षेप और कर्मचारियों का स्थानीय होने के साथ निष्ठा की कमी है और उनके द्वारा जरूरतमंदों का हक़ मारा जा रहा है. नहीं तो ऐसी कोई बात नहीं है कि सरकार इतना पैसा खरच करने के बाद, कर्मचारियों के वेतन भत्तों पर भी बड़े खरच के बाद यह स्थिति है. इसमें कहीं न कहीं दाल में काला है या पूरी दाल ही काली है, इस पर चिंतन जरुरी है.

देश के नेता गद्दी पाने वोट खाते हैं. वोट के लिए नोट लेते हैं. नोट कमाने कमीशन लेते हैं. इसमें कोई परेशानी नहीं हैं. कारण ये तो उनका उसूल है. इतने सबसे जनता को कोई परेशानी नहीं. कम से कम जिनका हक़ है उन्हें तो उचित सामान मिल जाये. कर्मचारियों, देखना उनका हक़ खाने का हश्र क्या होगा, वो पोषण आहार के अभाव में मरेंगे. और तुम अपना आहार खाकर भी न जियोगे, क्योंकि 'रहिमन हाय गरीब की कभी न निष्फल जाए'. जिनका हक़ है वह उनको नहीं मिला तो इस जन्म में ही भोगना पड़ता है, कष्टों का अम्बार.


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