वोट मांगने वालों को मारने लटठ लेकर बैठी महिलायें


''वोट मांगने वालों को तो हम मारेंगे लटठ. यह है हमारी देवभूमि की महिला शक्ति का दर्द. क्या इस दर्द की दवा किसी के पास नही? तो फिर हर पांच साल बाद क्यों चुनते हैं, हम जनप्रतिनिधि?''
                                                                   @ आकाश नागर 

स्थान : बागेश्वर का गौमती पुल। समय : रात के पौने ग्यारह बजे हैं.
हम चुनावी सर्वे करके होटल लौट रहे हैं. देखते हैं कि आधा दर्जन महिलायें हाथ में लाठियां लेकर बैठी हैं. ठंड में महिलाओं का इस तरह सडक किनारे बैठना हमे अटपटा लगता है. इतनी रात को घर से बाहर हाथों में लाठियां लिए बैठने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि हम आवारा पशुओं से अपनी फसलों की रक्षा कर रही हैं. हमारी फसलों को आवारा पशुओं ने बर्बाद कर दिया है. कहती हैं कि कई सालों से वह रात को इसी तरह अपने खेतों की पहरेदारी करती हैं. चाहे प्रदेश में भाजपा की सरकार रही हो या कॉग्रेस की. सभी से अपनी फसलों को आवारा पशुओं से बचाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.


जब उनसे हमने कहा कि चुनाव चल रहे हैं, वह ऐसे में उम्मीदवारो से इस समस्या का समाधान करने के लिए क्यों नहीं कहते हैं? इस पर सभी महिलायें आक्रोशित हो उठती हैं और कहती हैं कि वोट मांगने वालों को तो हम मारेंगे लटठ. यह है हमारी देवभूमि की महिला शक्ति का दर्द. क्या इस दर्द की दवा किसी के पास नही? तो फिर हर पांच साल बाद क्यों चुनते हैं, हम जनप्रतिनिधि? ऐसे जनप्रतिनिधि जो देशहित, राज्यहित और समाजहित की बजाय स्वहित पर उतर जाते हैं? और अपना घर भर लेते हैं? ऐसे नेताओं को चुनकर जनता को मिलता क्या है?



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