वक्त, जो मैं यूँ ही जाया करता हूँ..


अंधेरों की आगोश में
जब
कुम्हलाने लगता है
सूरज
और दिन की गर्मी पर 
ढ़कने लगती है सर्द हवाओं की चादर

ऐसे में
आसमां की सल्तनत पर
चांद की ताजपोशी होती है
यह वक्त
गीत और गजल कमाने का होता है 
जो मैं
यूँ ही जाया करता हूँ
तुम बिन.


                                         @ आशीष चौबे 
Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc