'वेलेंटाइन डे' विरोध करिए, पर अमर शहीदों से मत जोड़िये





कुछ लोग whatsapp और facebook पर बिना सोचे समझे पोस्ट शेयर/ वायरल कर रहे हैं. उस पोस्ट की पीछे की सच्चाई क्या है, ये जानने का प्रयास भी नहीं करते. ये भी नहीं जानना चाहते कि उसका परिणाम क्या होगा. कुछ भी गलत पोस्ट कितना नुकसान करती है, यह हमें समझना चाहिए. 

हाल में कुछ भाई वेलेंटाइन डे को भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे महान क्रांतिकारियों, अमर शहीदों के साथ जोड़कर अनावश्यक भ्रम फैला रहे हैं. यह कतई ठीक नहीं कहा जाएगा. 

आप वेलेंटाइन डे का विरोध करना चाहते हैं, करिए, अच्छी बात है, हम भी साथ हैं, लेकिन भाई अमर शहीदों का अपमान तो मत करो. वायरल पोस्ट के अनुसार अमर शहीद भगत सिंह जी की मृत्यु 14 फरवरी गलत बताई जा रही है, सही तथ्य यह है कि उनका जन्म 27 या 28 सितम्बर 1907 को हुआ और उनकी मृत्यु तारीख 23 मार्च 1931 है. जैसा कि यहाँ इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं-
https://hi.wikipedia.org/wiki



23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दी गई 
वे भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे. भगतसिंह संधु जाट सिक्ख थे. वे देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह भुलाया नहीं जा सकता. इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया. जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया. सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया. पहले लाहौर में साण्डर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की. भगत सिंह को समाजवादी, वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा में रुचि थी.
उस समय का प्रमुख दैनिक एक बड़ा साक्ष्य 

26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया. 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई. फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई. इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई, परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई. इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 13 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें. भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गांधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की. यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए.
ऐसा गलत फैलाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं 



23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई.[9] फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए.[10] कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले." फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो."
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, माय रँग दे बसन्ती चोला...

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये, इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये. फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये. जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा. गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये. इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये. जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया. और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये. इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गांधी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे. इस कारण जब गांधी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे, तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गांधी जी का स्वागत किया. एकाध जग़ह पर गांधी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया.

उम्मीद करते हैं कि आगे से कुछ भी पोस्ट करने से पहले हम उसकी विश्वसनीयता अवश्य परखेंगे. 

सूरज शर्मा , विदिशा 


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