उसने कहा था ''मुझे जीना अच्छा लगता है, मौत से बहुत डर लगता है"





''संभव है ये भी भूख से मर गया हो.. या रोटी चुराने के महापाप में मार दिया गया हो..''

कल यात्रा के दौरान आगरा-ग्वालियर के बीच एक (इस) युवक से मुलाकात हुई। शरीर के बाहर तक निकल आई हड्डियाँ। मटमैला, नंगा बदन, कुछ पागल सा लगा वो पहली नजर में! बोगी पूरी तरह से खाली थी सो पूरी तन्मयता से मैं उसकी भाव-भंगिमा को देख-समझ पा रहा था।आखें बिना परिचय के ही मनुष्यता के भांवो को पढ़-बूझ लेती हैं

''भैया, मुझे काम करना है। मैं झाड़ू -पोंछा कर लेता हूँ। बर्तन भी धो लेता हूँ। हाँ स्त्री भी कर लेता हूँ। मुझे भूख लगती है। मुझे काम दिलवा दो भैया। वरना मैं मर जाऊँगा.. मुझे जीना अच्छा लगता है.. मरने से बहुत डर लगता है।'' न जाने किस विवशता या भावावेश में एक साँस में वह बोलता गया

उसे विक्षिप्त मान बैठा मेरा अनुमान छन्न से अपने विवेक पर लौट आया उसकी भाषा, बात करने का तरीका उद्विग्न होते हुये भी पूर्णतः सभ्य, शिक्षित, परिष्कृत था। (मानसिक उद्विग्नता या भूखे पेट का विचलन जरूर दोषपूर्ण माना जा सकता था)

दिमाग ने कहा, कुछ देर पहले दिये गये दयालुता पूर्ण पोपकार्न के अतिरिक्त भी वह कुछ और सहायता चाहता था, आम जगहों पर ये आम सी बात है.. छोड़ उसे, लेकिन मन बाहर गुजरते जा रहे पेड़, पहाड़,खेत -मेड़ो से होते हुये बार-बार उसी की ओर जा टिक रहा था। अनायास ही मैं अपनी सीट से उठ उसके सामने वाली सीट पर जा बैठा।

कहॉ से आ रहे हो? कहाँ जा रहे हो? घर कहाँ है? कौन-कौन है घर में? पढ़े-लिखे मालूम होते हो? न जाने ऐसे बेहुदा सवाल मैं क्यूं पूछता गया। दयालुता के बोध ने संभवतः मेरे अहंकार को शब्द दे दिये थे। किंतु वह तनिक भी असहज या बिना किसी आग्रही बोध के पूर्ववत ही, सहजता से सब कुछ बताता गया.. वृतांत असामान्य होते हुये भी सामान्य ही था। जड़विहीन पौधों की नियति। अपनों का दुराव, समय का घाव.. बस इतना भर ही..।

भैया, मुझे भूख लगती है। मैं काम करना चाहता हूँ, पर सब मुझे पागल बोलते हैं मुझे जिंदा रहना अच्छा लगता है मरने से मुझे बहुत डर लगता है अंत में पुनः दोहराई-तिहराई गई उसकी ये याचना कानों से होते हुये, मेरे दयालुता पूर्ण अंहकार को भेद, सीधे मर्म पर अनुगुंजित होती रही मेरे भीतर।

अंतडियों से चिपक आया पेट.. माँस को स्थगित करती बाहर को निकल आई हडिडयॉ.. अपने पर से मेरी नजर को हटने ही नहीं दे रहीं थी। ये बहुत जल्दी मर जायेगा ''कुछ कर... कुछ कर..। मेरे भीतर एक अजीब सा शोर उठ खड़ा हुआ था..। ..कुछ कर.. कुछ कर..

हाँ, कुछ करना होगा। कुछ करना होगा। ..लेकिन क्या, कैसे? वो भी एक सफर के दौरान, अंजान पड़ावों के बीच इसी उधेड़-बुन से मन आंदोलित था कि तभी दिमाग फिर बोल उठा.. 'नालायक, असफल इंसान, खुद अपने शहर और दुनिया में अपनी पहचान खो चुका... तू क्या आयेगा किसी के काम। औकात से अधिक मत सोच.. सौ-पचास रूपया दे और खुश हो ले कि कुछ तो भला कर पाया किसी का। इससे ज्यादा मत सोच..

कुछ सोच समझ पाता। दिमाग के बताये औकात के मुताबिक सौ-पचास भी दे पाता कि उसके पहले ही ग्वालियर स्टेशन आ गया। रिजर्व खाली बोगी में यकायक रिजर्व सभ्यताओं के शोर और रेलम-पेल के बीच वो नदारद् हो चुका था.. उसकी जगह पर कोई लेपटाप लिये आ बैठा था.. तो कोई मेरे कंधे पर हाथ रख बता रहा था कि ये उसकी बर्थ है.. मैं अनाधिकृत हूं उस बर्थ पर...

अपनी बर्थ पर वापस आ... कर्तव्य विमूढ सा मैं सोचता रहा... अपनी विफलताओं/अक्षमताओं/सामर्थ्यहीनता को... जो उसे ये भी न कह सकी कि चल मेरे शहर... तू जिंदा रहेगा... भूख से मरेगा नहीं। शहर... क्यूंकि मैं स्वंय अपने शहर के लिये अनाधिकृत जो हो चुका हूँ...

@ प्रेम प्रदीप, भोपाल 



Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc