युधिष्ठिर नहीं हूँ मैं




कहाँ, किस बसन्त में फूलेगी केसर
मन की क्यारियों में
सोचते-सोचते यहाँ तक आ गया हूँ मैं
कश्मीर देखा नहीं, मैंने स्वप्न में भी
फिर भी मन में एक डल झील
लेती रहती है हिलोरें !
कौन, कब आकर
इसमें कमल सा खिलेगा?
प्रश्न यह तैरता रहता है हवाओं में 



और यक्ष
अनुत्तर-क्षुब्ध
शापमुक्त नहीं करता जल को
उत्तर मेरे पास नहीं है
क्योंकि
मैं युधिष्ठिर नहीं, धनञ्जय हूँ !




@ धनञ्जय सिंह, गाजियाबाद 

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News Digital India 18

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