तावीर





नजर ले जा वहां तक तू 
जहां तक मैं नजर आंऊ
मुझे मत ढूंडना हरगिज
जहां गुमनाम हो जांऊ 
उलझते ही चले जाते हैं गैसू जिंदगानी के 
तु ही बतला दे ए दिलवर 
कहां तक इनको सुलझाऊं  
तुम्हारी आखं से आसू टपक जाते हैं सुनते ही
अब ऐसे में तुम्हारी दासता 
मैं कैसे दोहराऊं  
जो मैंने जिन्दगी और मौत की 
तहरीर लिख दी है 
समझते क्यों नहीं लोगो 
कहां तक तुमको समझाऊं 
मैं सौदाई हूं तेरे हुस्न का 
तुझको खबर भी है 
मैं अपने खुआब की तावीर
बतला किसको समझाऊं 

                                               @ बी एल अग्रवाल एडवोकेट


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