अहसास, जो बोए हैं मैंने उन गमलों में...!






सुनो
कुछ स्फुट से अल्फ़ाज हैं 
मेरे अंदर  
जो मैं अक्सर 
अपने अंदर छुपा कर रखती हूँ 
नहीं देती आयाम 
उन्हें मैं बस बो देती हूँ 
उसे मैं आँगन के रखे कौने वाले 
मिट्टी के गमले में... 
आँगन में खड़ा वह नीम का पेड़ 
अक्सर ताकता है मुझे 
और मौन प्रश्न साधता मुझ पर 
कितनी अनकही बातों के बीज 
अक्सर बोती हूँ मैं 
कौने में रखे गमले में.. 
और वह निहारता 
बस एक उत्तर मांगता 
किस रँग के और कौन से फूल 
कौन से विचार और कैसे अहसास 
आएंगे उन गमलों में...! 
जो बोए थे मैंने हर अहसास 
अलग अलग मिट्टी में..

                      @ सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ 


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