अपने में कैद आदमी



लघुकथा 




ट्रेन के डिब्बे में आस-पास से बिल्कुल बेखबर, वह नवयुवक अपने 'एंड्राइड-सेट' की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए, सोशल-मीडिया के 'नेट' में उलझा हुआ था|

"लाइए अपना टिकिट दिखाइए|" टिकिट चेकर ने उससे कहा|
" जी यह लीजिए|"
" यह तो साधारण टिकिट है, आप रिजर्व कोच में कैसे चढ़े|" टिकिट चेकर झल्लाया|
" सॉरी सर ,मैं जल्दी-जल्दी में चढ़ गया ,आगे से ध्यान रखूंगा|" उसने विनम्रता पूर्वक कहा|
" सॉरी -वॉरी छोड़ों ,पांच सौ रुपये की पेनाल्टी लगेगी, जल्दी पैसे निकालो|" टिकिट चेकर गुर्राया|
" सर मेरे पर्स में केवल दो सौ रुपये ही हैं |"
" तो मैं क्या करूँ ,बाकी पैसे अपनी जेब से भरूँ ?"
" सर प्लीज समझने की कोशिश कीजिये, मैं एक ज़रूरी इंटरव्यू देने जा रहा हूँ,मेरी ज़िंदगी का सवाल है|" वह गिड़गिड़ाया|
" तुम्हारे जैसे बहानेखोर मुझे रोज छत्तीस मिलते हैं ,अगली स्टेशन पर मैं तुम्हें रेल-पुलिस के हवाले करूँगा|"
डिब्बे में बैठे यात्री यह नजारा देख आपस में खुसुर-पुसुर कर रहे थे ,परन्तु आगे बढ़ कर कोई कुछ बोलने या उस युवक की मदद करने को आगे नहीं आया|

स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही ,टिकिट चेकर ने युवक के लाख गिड़गिड़ाने पर भी उसे रेल पुलिस के हवाले कर दिया|

राजेन्द्र बाबू को संयोग से उसी स्टेशन पर उतरना था | वह डिब्बे में युवक के साथ हुई इस घटना को लगातार देख रहे थे | कुछ ही देर में गाड़ी प्लेट-फार्म से रवाना हो गयी| पुलिस उस नवयुवक को लेकर थाने की ओर जा रही थी|
अब राजेन्द्र जी से रहा नहीं गया | उन्होंने पुलिस वालों से इस नवयुवक से चर्चा करने की अनुमति मांगी|

" तुम्हारा क्या नाम है|"
" जी सुरेंद्र|"
" कहाँ रहते हो|"
" भोपाल|"
" भोपाल में कहाँ रहते हो|"
" अयोध्या नगर|"
"अरे ,अयोध्या नगर में तो मैं भी रहता हूँ , तुम अयोध्या के किस सेक्टर में रहते हो|"
" सर, जी सेक्टर में पार्क के सामने|"
" अरे वहीं तो मैं रहता हूँ, परन्तु आश्चर्य !मैंने तुम्हें कभी देखा नहीं |" उन्होंने आश्चर्य से कहा|
" हाँ अंकल ,मैं बाहर काम से ही निकलता हूँ, ज़्यादातर मेरा समय सोशल मीडिया पर निकलता है|"
" सोशल मीडिया पर तुम्हारे हजारों मित्र हैं, मगर अफसोस , मोहल्ले-पड़ोस में तुम्हारे मित्र नहीं है| आज अगर तुम सोशल मीडिया को छोड़ थोड़े बहुत सोशल भी होते तो यह संकट तुम्हारे ऊपर नही आता|" कह कर उन्होंने जुर्माने की रकम अदा कर उसे पुलिस से आज़ाद करवा दिया| परन्तु अफसोस उसका ज़रूरी इंटरव्यू जा चुका था|

घनश्याम मैथिल "अमृत", भोपाल 


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