सार्थक चर्चा का उपयुक्त समय, आखिर सभी तंत्र हैं तो आम आदमी के प्रति जबाबदेह ही







''भोपाल के जागरूक अधिवक्ता के खुले विचार.  

अवमानना, एक ऐसा अधिकार कि उनकी कार्यप्रणाली का पोस्टमार्टम न हो सके.''



संविधान के सभी स्तम्भ बराबर हैं और सभी की कार्यप्रणाली से देश की आम जनता को अवगत होना जरूरी भी है. यह हमारा अधिकार भी है. कार्यपालिका और विधायिका की प्रशासनिक शक्तियों पर देश में हमेशा चर्चा होती रही और इन्हें निंदा और प्रशंसा का सामना हमेशा करना पड़ा, लेकिन न्यायपालिका हमेशा ऐसी स्थिति का सामना करने से मुक्त रही. इसका कारण यह नहीं था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता ज्यादा थी, बल्कि उनके पास अवमानना का एक ऐसा अधिकार था, जिससे कि उनकी कार्यप्रणाली का पोस्टमार्टम न हो, जो उसके लिए सुरक्षा कवच का कार्य करता था, लेकिन अब देश की सर्वोच्य न्याय व्यवस्था के प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया है, और वो भी उन्ही के रक्षकों के द्वारा.

इस विषय पर बहस करने का यह एक श्रेष्ठ अवसर है कि प्रकरणों का न्यायलयों में भेजने का अधिकार क्या विवेकाधिकार होना चाहिए या इस अधिकार को भी कुछ बंधनों के साथ प्रयोग में लाया जाना चाहिए. अधीनस्थ न्यायलयों से लेकर सर्वोच्य न्यायलय तक इस अधिकार का दुरुपयोग किये जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है. न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और ज्यादा आम जनों के मध्य स्थापित हो, इसके लिए इस अधिकार की स्पष्ट व्याख्या बहुत जरूरी है और इस बहस पर अवमानना का डंडा भी नहीं चल सकता, क्योंकि यह न्याय व्यवस्था के प्रशासनिक अधिकार से जुड़ा मामला है न कि न्यायिक प्रक्रिया का कोई विषय.

बहुत अच्छा अवसर है यह मुख्य न्यायधीश के इस निरंकुश अधिकार पर कुछ अंकुश लगाने का. इसका फायदा यह होगा कि निर्धारित प्रक्रिया अधीनस्थ न्यायलयों तक लागू होगी, जहां प्रकरण के आबंटन पर बड़े बड़े खेल खेल जाते हैं. चारो न्यायधीश बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने देश की जनता को इस अहम विषय और उसके प्रभाव से परिचित कराया. आज पूरे देश में इस विषय पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि आखिर सभी तंत्र हैं तो आम आदमी के प्रति जबाबदेह ही.

- प्रियनाथ पाठक, अधिवक्ता भोपाल  

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