इस तरह इतिहास मत बदलो की सर्वांग जल उठे...




सुनो गर 
सुन सकते तो
सुनो ...
उसकी चीख सुनो...
उसकी मर्मान्तक पीड़ा सुनो...
लपलपाती लपटें तुझसे 
क्या कह गयीं ...?
कहाँ से प्यार का बीज
अंकुरित करती सी दिख गयीं ?


इस तरह इतिहास मत बदलो
की रूह भी कराह उठे...
इस तरह इतिहास मत बदलो 
की सर्वांग जल उठे...।।


क्या याद नहीं तुझे 
की क्योंकर जली थी
स्वेच्छा की बलि-वेदी पर 
क्योंकर चढ़ी थी?
तब भी दर्द न दिल में कोई शेष था,
मुख पे हजारों सूर्य का ओज था।


जिसकी छाया से बचने
हजारों छत्राणियों के साथ 
"जौहर" कर गयी
आज उसके साथ 'गलबहियां'
करते देख 
उसकी वेदना 
समंदर से भी गहरी हो गयी।।

@ रश्मि रानी, पटना 
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