क्यों हम किसी के इशारे पर



सियासत में दंगे 
हमारे अपनों के ही खून पीते हैं, 
और हम पीने देतें हैं?
एक मां की गोद सुनी होती है.
एक सुहागिन अपने श्रृंगार को खोती है.
एक बहन अपने भाई से महरूम हो जाती है.
एक हँसते-खेलते परिवार की खुशी 
राख हो जाती है.
क्या मिलता है? हमें अपनों को खोकर. 
कभी सोचियेगा.
क्यों हम किसी के इशारे पर 
अपनों को दंगो में झोंक देतें हैं?
कभी वक्त मिले तो सोचियेगा जरूर ..

@ डॉ. रमेश यादव 'यादवेन्द्र', अमेठी से 

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