'पद्मावत' : क्या है अराजकता के पीछे की ख़ास बजह?







''पैसे के दम पर किसे नहीं खरीदा जा सकता, क्या न्यायालय क्या सरकार. इसी के साथ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि विरोध जब ज्यादा ही बढ़ गया तो 'पद्मावती' को 'पद्मावत' कर दिया गया. मैसेज ये गया कि नाम बदल कर मूर्ख बनाने का प्रयास किया जा रहा है. विरोध नाम बदलने का था या आपत्तिजनक सामग्री हटाने का. और आपत्तिजनक सामग्री थी ही क्यों? बात भावना की है. फिल्मकार की भावना ही गलत है. खुद अश्लीलता परोस रहे हैं और कहते हैं कि दर्शक यही चाहता है. यह गलत है. इसका खामियाजा भी भुगतना ही होगा. यही बातें अराजकता को जन्म देती हैं. सच यही है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर फिल्मकार बे-लगाम हो गए हैं. ऐसे में विरोध जायज है. आज जरूरत है कि देशहित सर्वोपरि हो. किसी भी हाल में 'पद्मावती' हो या 'पद्मावत', प्रदर्शन नहीं होना चाहिए.''

पीछे की भावना कैसे छुपाओगे?

सुप्रीम कोर्ट ने न केवल फिल्म को मंजूरी दे दी, बल्कि सरकारों से प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के निर्देश भी दिए. दूसरी ओर देश के कई राज्यों ने 'पद्मावती' से 'पद्मावत' बन जाने के बाद भी इसे बैन कर रखा है. और विरोध में अब केवल करणी सेना ही नहीं है, बल्कि एक बड़ी लाइन खड़ी हो गई है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी फिल्म मंजूर नहीं है. 

करणी सेना के संरक्षक लोकेंद्र सिंह कालवी ने धमकी दी है कि सिनेमा हॉल मालिक फिल्म को रिलीज नहीं करें या फिर वे तय कर लें दिवाली मनाएंगे या लंका जलवाएंगे. पहले ही प्रतिबंध लगा चुके मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फिल्म के प्रदर्शन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. उन्होंने कहा है कि उनकी सरकार कोर्ट के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी. गुजरात में हिंसा के बाद सिनिमा मालिकों ने निर्णय किया है कि 'पद्मावत' नहीं दिखाएंगे. 

गलत मानसिकता उजागर, विरोध के बाद हटाये गए इतने सारे कट


सवाल यह है कि इतना हंगामा हुआ ही क्यों? सेंसर बोर्ड का काम था फिल्म प्रदर्शन योग्य है या नहीं, फिर क्यों सरकारों के साथ सर्वोच्य न्यायालय तक मैदान में कूदा? बात एक 'पद्मावत' फ़िल्म की नहीं है, असल में फिल्मकारों की दादागिरी पर आपत्ति है, जो किसी भी समुदाय या धर्म या आस्था से खिलवाड़ करके डंके की चोट पर पैसा कमाना चाहते हैं, लोगों की आपत्तियों का समाधान भी नहीं करना चाहते और न ही सामाजिक स्थिति बिगड़ने की परवाह करते, और केवल असंगठित धर्मों, समुदायों वर्गों को ही अपना निशाना बनाते हैं. जहां छेड़छाड़ पर खतरा महसूस करते हैं, वहां इन फिल्मकारों की हिम्मत नहीं होती. इस पर न्यायालय व सरकारें भी मूक दर्शक बन जाते हैं और लोगों की आपत्तियों को दबा देते हैं. 

कहा यह भी जा रहा है पैसे के दम पर किसे नहीं खरीदा जा सकता, क्या न्यायालय क्या सरकार. इसी के साथ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि विरोध जब ज्यादा ही बढ़ गया तो 'पद्मावती' को 'पद्मावत' कर दिया गया. मैसेज ये गया कि नाम बदल कर मूर्ख बनाने का प्रयास किया जा रहा है. विरोध नाम बदलने का था या आपत्तिजनक सामग्री हटाने का. और आपत्तिजनक सामग्री थी ही क्यों? बात भावना की है. फिल्मकार की भावना ही गलत है. खुद अश्लीलता परोस रहे हैं और कहते हैं कि दर्शक यही चाहता है. यह गलत है. इसका खामियाजा भी भुगतना ही होगा. 

एक बात और उल्लेखनीय है कि कहा जा रहा है संजय लीला भंसाली को अपनी फ़िल्में विवादित बनाने की आदत पड़ गई है. इस प्रकार वह प्रमोशन का पैसा बचाना कहते हैं. मुफ्त का प्रचार की यह भूंख इस बार भारी पड़ गई है.

यही बातें अराजकता को जन्म देती हैं. सच यही है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर फिल्मकार बे-लगाम हो गए हैं. ऐसे में विरोध जायज है. आज जरूरत है कि देशहित सर्वोपरि हो. किसी भी हाल में 'पद्मावती' हो या 'पद्मावत', प्रदर्शन नहीं होना चाहिए.

चित्रांश 


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