मेरी गरीबी की चर्चाओं से बनती, गिरती हैं सरकारें




हाड़-मास की कटी पतंगें
कल देखीं थीं कागज़ बांस की
उड़ती पतंगें.
आज देखीं
हाड़ मास की कटी 
पतंगें.


अर्थ से टूटी!
और अर्थ पर लेटी!

शिक्षा की डोर से छूटी
राजनीतिक वोट की मंजा
सामाजिक टूटन
परछाई सी लेटी
इनकी काया.
आजादी सत्तर की.
फिर भी खड़ा क्यों नहीं हो पाया?

धूल में रचा बचपन.
नंगी गरीबी को
पछाड़ती खिलती हँसी.

मैं नहीं गिरा
गिरे तो सारे तंत्र!
जो लगे हैं मुझे उठाने में.

कोई गिरा वोट उठाने मैं.
कोई अपने को चमकाने में
कोई सेवक बनने की चाहत में 
तो कोई राजनेता बनने की आहट में.

जो आये थे मुझे उठाने
मुझे छोड़कर,
वो सारे गिरे हुए उठ गए.
और खड़े हो गये उनके महल
मेरी ही चर्चाओं में.

मैं औंधा पड़ा हूँ
धूल भरे हालातों में,
ऐसा क्या है मुझमें
जो मुझे उठाने आता है
वो केवल खुद उठता है.
उठती और उड़ती पतंग की तरह.
मुझसे बांधकर अपनी डोर
मैं केवल डोर थामे ही रहा
जमीन पर.
और वह
इतना ऊपर उठ गया
कि फिर नहीं दिखता मुझे.
न उसे मैं.
ऑंखों से ओझल!
बिल्कुल कटी पतंग की तरह.

मेरी गरीबी की चर्चाओं से सरकारें भी बनती हैं
और सरकारें भी गिरती हैं.
लेकिन मुझे कभी नहीं उठाया.

यदि मैं उठ गया गया तो वोट की डोर टूट जाएगी.
फिर कहाँ से लाएंगे अलग मंजर
थामने कटी पतंग को.
रहने लगा यदि महलों में
तो इनकी महलों की नींव कौन खोदेगा?
कौन भरेगा समाज के विद्रूप गड्ढों को?
कौन उतरेगा भूमिगत बहते गंदे नालों में?
कौन पौंछेगा संगमरमरी फर्श?
और कौन आएगा सुबह का दूध और अखबार फेकने/
और खेतों में अनाज उगाने?

मैं पतंग की डोर नहीं
उनकी उन्नति का धागा हो गया.
इसलिये मुझे जकड़ कर रखे हैं
मुक्त न कर सकेंगे
तब तक ये दम्भी पतंगबाज नीचे न उतरेंगें
और देखता रहूंगा मैं यहीं से उनके इठलाते चमकते आकाश को.


© मोतीलाल आलमचन्द्र

Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc