बच्चों की मासूमियत के हत्यारे कौन?


''दोषी कौन, चलो सामने लाया जाए!
हमारे बच्चों की मासूमियत के हत्यारे कौन, 
उन्हें ममता की अदालत में पेश किया जाए।''


फिर दो दिन से जेहन में उथलपुथल मची हुई है। बुधवार शाम, किसी पार्टी में थी। दोस्त, स्टेटस अपडेट कर रही थी, मेरी नजर ऑनलाइन हुई एक खबर पर गई। लखनऊ के स्कूल में हाईस्कूल की छात्रा ने पहली के बच्चे को बाथरुम में चाकुओं से मारा और लहूलुहान हालत में बाथरुम में बंद कर दिया। 

हे राम...इस खबर को पढ़ने के बाद मन और मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया। आंखों के सामने मासूम प्रद्युमन का मुस्कुराता चेहरा घूमने लगा। कान में लाउड म्यूजिक की जगह अजीब सा कोलाहल घुल गया। डराने वाला...मन पार्टी की रंगीनियों से बचपन की मुस्कुराहटों में खो गया। अच्छी सी सच्ची सी मुस्कुराहटें। खिलखिलाता बचपन। खेलता-कूदता और अपनों के सायों से गुलजार होता बचपन। 

आज घर हो या स्कूल बच्चों को पीटना मना है, हमने अपने बड़ों के थप्पड़ खाए हैं, स्कूल में टीचर्स की बेंत को देखकर ही चुप हो जाते थे। बड़ों की आंखों के भाव ही बता देते थे वे गुस्सा हैं या खुश। हम यह करे या ना करें।


आज एकल परिवार हैं, उसमें एक बहुत हुआ तो दो बच्चे। माँ-बाप सुबह से शाम तक काम में बिजी, आज के समय की माँग है दोनों का वर्किंग होना। वर्कोहोलिक...माँ यदि घरेलू है तो भी उसका सोशल सर्कल है, लाइफ स्टाइल है। बची-खुची कसर बुद्धु बक्से के वाहियात सीरियलों में खत्म कर छोड़ी है। इस बीच बच्चों का बचपन...बेहद छोटे हैं तो शिनचेन-डोरेमान जैसे सीरियल, थोड़े बड़े हुए तो टेबलेट और एक्सबॉक्स जैसे गेम्स में खत्म...माँ-पापा की अपनी लाइफ स्टाइल, बच्चों की अपनी....इस लाइफस्टाइल गैप के बीच में खत्म हो रहा बचपन। 

उम्र से पहले बड़े हो रहे बच्चे....एक बार सोचिए लखनऊ या रेयान स्कूल में हुई दर्दनाक घटनाओं का असल दोषी कौन? हमारे बच्चों की मासूमियत के हत्यारे कौन? मैं एक माँ हूं, अपने बच्चों की मासूमियत के हत्यारों को अदालत में पेश करना चाहती हूं। अफसोस...कटघरे में मैं खुद को और अपने जैसी माँओ और पिताओं को खड़ा पाती हूं।

@ श्रुति अग्रवाल 

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