कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का पिता नहीं हो सकता, फिर महात्मा गांधी राष्ट्रपिता कैसे?



भोपाल। एक गलत बात हमारे मन में बैठा दी गई कि महात्मा गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं गांधी जी तब राष्ट्रपिता हो सकते थे, जब उनसे पहले हमारा राष्ट्र भारत न होता देश पहले से अस्तित्व में है, फिर देश में बाद जन्मे गांधी राष्ट्रपिता कैसे हो सकते हैं? यह सवाल उठाते हुए शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा है कि आजादी की लड़ाई के बाद महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई, टैब से पूरा देश गांधी जी को राष्ट्रपिता कहता है, लेकिन यह सच नहीं है हाँ वह राष्ट्र पुत्र कहे जा सकते हैं।

शंकराचार्य जी ने कहा कि कोई भी राष्ट्र से बड़ा नही हो सकता है। सभी राष्ट्रवादियों के लिए राष्ट्र ही सर्वोपरि है, तो इस राष्ट्र में रहने वाला कोई इस राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता है?

मोहनदास करमचंद गांधी कैसे बने राष्ट्रपिता?
4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए महात्मा गांधी को ‘देश का पिता’ (राष्ट्रपिता) कहकर संबोधित किया। बाद में भारत सरकार ने भी इस नाम को मान्यता दे दी। गांधी जी के देहांत के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो के माध्यम से देश को संबोधित किया था और कहा था कि ‘राष्ट्रपिता अब नहीं रहे’।

गृह मंत्रालय भी नहीं मानता राष्ट्रपिता
सरकार महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि नहीं दे सकती, क्योंकि संविधान एजुकेशनल और मिलिट्री टाइटल के अलावा कोई और उपाधि देने की इजाजत नहीं देता। गृह मंत्रालय ने आरटीआई में पूछे एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। यह सवाल लखनऊ की 11वीं की एक स्टूडेंट ऐश्वर्या पाराशर ने पूछा था।

ऐश्वर्या ने कई आरटीआई दाखिल कर पूछा था कि गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ क्यों कहा जाता है? जब उसे बताया गया कि गांधीजी को ऐसी कोई उपाधि नहीं दी गई है, तो उसने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी करने की रिक्वेस्ट की थी।

ऐश्वर्या की अर्जी इस निर्देश के साथ गृह मंत्रालय को भेजी गई थी कि उनकी रिक्वेस्ट पर क्या कार्रवाई की गई, इसका खुलासा किया जाए। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का खिताब न दिए जाने के लिए सांवैधानिक मजबूरियों का हवाला दिया। मंत्रालय ने कहा कि संविधान की धारा 8(1) एजुकेशनल और मिलिट्री टाइटल के अलावा कोई और उपाधि देने की इजाजत सरकार को नहीं देती।

महात्मा गांधी को राष्ट्र ने बनाया, 
राष्ट्र को महात्मा गांधी ने नहीं बनाया
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने यह सवाल उठाया है कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता क्यों कहा जाता है, कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता है? उनका यह सवाल कई लोगों को बुरा लग सकता है, क्योंकि पिछले 65-66 वर्ष से हम सुनते आ रहे हैं कि महात्मा गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं। यानी, यह बात हमारे दिमाग में बैठी हुई है औ मनोवैज्ञानिक सच है कि हम अपने दिमाग में बैठी बात के विपरीत कुछ नहीं सुन पाते हैं, यदि उसके खिलाफ कोई कुछ बोलता है, तो हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं। मगर ज्योतिष और द्वारका पीठाधीश्वर ने जो कहा है, उसके लिए बुरा मानने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो इस बात की कि उन्हौंने जो सवाल उठाया है, उस पर खुलकर बात करें और जब संवाद होगा तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि उन्होंने जा कहा है, सच भी वही है।

भारत एक सनातन राष्ट्र है। जिस देश में सभ्यता और संस्कृति सबसे पहले विकसित हुई, वह भारत ही है। जब यूरोप, अमेरिका, अरब के लोग जंगलों में रहते और पशुओं की तरह जीवन गुजारते थे, तब भारत के ऋषि-मुनियों के श्रीमुख से वेदों की ऋचाएं सुनने को मिलने लगी थीं। जब दुनिया के लोगों को अक्षर ज्ञान नहीं था, तब भारत में पुराण रचे जा रहे थे। दुनिया के लोग जब नहीं जानते थे कि परिवार क्या होता है, तब भगवान श्रीराम पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन जाकर वापस लौट चुके थे। राजनीति-कूटनीति को तो दुनिया ने बहुत बाद में समझा, उससे हजारों वर्ष पहले भगवान श्रीकृष्ण ने केवल और केवल कूटनीति के सहारे पांडवों को महाभारत के युद्ध में विजयश्री दिला दी थी। यह सब भारत नाम के राष्ट्र में ही हुआ था। लिहाजा, तथ्य यही है कि महात्मा गांधी को राष्ट्र ने बनाया, राष्ट्र को महात्मा गांधी ने नहीं बनाया। और यही वह तथ्य है, जो साबित करता है कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता नहीं हो सकते। हाँ वे राष्ट्र के महान पुत्रों में से एक हैं।

मेरा मकसद महात्मा गांधी को कम करके आंकने का नहीं है। देश को आजाद कराने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। दुनिया में महात्मा गांधी एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं, जिन्होंने अहिंसा का एक अस्त्र की तरह प्रयोग किया। जिस समय दुनिया में खून खराबे के माध्यम से सत्ता परिवर्तन हो रहे थे, सोवियत संघ में लेनिन और उसके कुछ ही वर्षों बाद चीन में माओ के नेतृत्व में खून-खराबा हो रहा था, जब अमेरिका गृहयुद्ध और दुनिया पहला विश्वयुद्ध भुगतकर दूसरे विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रही थी, तब महात्मा गांधी अहिंसा के सहारे उस ब्रिटिश साम्राज्य से टकरा रहे थे, जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। कारण यही है कि अल्वर्ट आइंसटीन जैसे वैज्ञानिक को कहना पड़ा था कि भावी पीढिय़ां भरोसा नहीं करेंगी कि दुनिया में गांधी जैसा भी कोई आदमी कभी हुआ था। यानी महात्मा गांधी का महत्व स्वयंसिद्ध है, पर उन्हें राष्ट्रपिता मानना फिर भी गलत है।

दुनिया के तमाम देशों में तमाम कद्दावर नेता पैदा हुए। अमेरिका को अमेरिका बनाने में जॉर्ज वाशिंगटन ने जो योगदान दिया, अगर वह गांधीजी के योगदान से ज्यादा नहीं था, तो कम तो किसी भी सूरत में नहीं था। लेकिन अमेरिकी जॉर्ज वाशिंगटन को अपने राष्ट्र का पिता नहीं मानते। आधुनिक चीन माओ की परिकल्पना का देश है, लेकिन चीनी माओ को उनके जीते जी चेयरमैन मानते थे, उनकी मृत्यु कब की हो चुकी है, लेकिन चीनियों के लिए माओ आज भी चेयरमैन ही हैं। लेकिन हमारे महात्मा गांधी हमारे राष्ट्र के पिता हो गए। कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का पिता कभी नहीं हो सकता। महात्मा गांधी भी भारत के राष्ट्रपिता नहीं हो सकते। यानी, जगद्गुरु शंकराचार्य ने जो कहा है, उनकी बात सौ फीसदी सच है। उसे ध्यान से सुना जाए और उस पर मनन भी किया जाए।

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