आजादी के बाद भी बुनियादी रूप से कुछ नहीं बदला, आखिर क्यों?



देश में बेचैन करने वाले सैकड़ों मुद्दे हैं. डराने वाली हज़ारों चिंताए हैं. मगर ध्यान से देखें तो इन सबके पीछे शायद कारण एक ही है. वह यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी कुछ भी नहीं बदल रहा. सदियों से बड़े पैमाने पर भारत में सब कुछ ज्यों का त्यों है. यह सरकार काम नहीं कर रही, यह सरकार लोकतंत्र का गला दबा रही है, दबी छुपी और कुछ सरे आम ज्यादतियां कर रही, लेकिन ऐसे ही आरोप पुरानी सरकार पर भी थे. तब ही लोगों ने यह नई सरकार चुनी थी. 

सरकार बदल गयी, स्थिति नहीं बदली. सब कुछ ज्यों का त्यों है. कुछ भी बदलाव नहीं हुआ. तमाम वायदों के बाद भी कुछ नहीं बदला. चीखने–चिल्लाने के बाद भी कुछ नहीं बदल रहा. बेशर्मी की हद तक बेनकाब किये जाने के बाद भी सब कुछ यथावत है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? 

निर्णायक रूप से कुछ क्यों नहीं बदल रहा? दरअसल थोडा बहुत जो बदलता हुआ दिखता भी है, वह इस रणनीति का हिस्सा दीखता है कि बुनियादी तौर पर कुछ न बदलना पड़े. जैसा है वैसा ही चलते रहे. सवाल है कि आखिर किसी भी कीमत पर हम बदलने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? इसके पीछे वजह क्या है? यह सिर्फ बेईमानी भर तो नहीं हो सकती. गहराई में कुछ और भी बात होगी, जो इससे भी बड़ी होगी, वरना 90 साल तक हमने आजादी की लड़ाई लड़ी. लाखों लोगों ने इसमें अपने आपको कुर्बान किया, लेकिन नतीजे में जब देश आजाद हुआ तो उस नई आजादी में भी बुनियादी रूप से भी कुछ नहीं बदला. 

जैसी अंग्रेज सरकार थी, कमोबेश वैसे ही हिन्दुस्तानी सरकार भी साबित हुई. चरित्र में जो थोड़ी बहुत भिन्नता दिखती है, वह भी महज भिन्न नस्ल भर के कारण है, वरना देश की हालत वैसी ही है कम से कम सरकार के रवैय्ये और लोगों की सोच के स्तर पर तो. सवाल है कुछ भी बदल क्यों नहीं रहा? 

लोकमित्र गौतम   

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