वो उम्र ढूंढते हैं




@ सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ  
मर मर के जीते हैं यहाँ लोग
और इसी को ये जिंदगी कहते हैं

जीना यह है मौत से बद्तर
हालात से समझौते यकीनन करते हैं
भविष्य की चिंता न हाथ में किस्मत
खुद को ही अपनी किस्मत कहते हैं
कचरे के ढेर पर गुजरती जिंदगी
सुबह श्याम वही बसर करते हैं
ललचाई नज़रों से देखते कहाँ वो
ढेर में ही वो सपने ढूंढते हैं
चाह नहीं उन्हें किसी शौक की
कचड़े में ही वो अपने शौक ढूंढते हैं
बचपन में ही रोजी हावी
जवानी की वो ढाल ख़ाली
बचपन से बुढ़ापे तक 

वो सिर्फ अपनी उम्र ढूंढते हैं


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