आम से मीठी महुइया ए बाबा...





वह एकदम भोला सरल और गंवई, कोहबर में जाने की खुशी में मगन। और इधर चतुर सालियों ने दुलहे का जूता ही नहीं मौर तक ग़ायब कर दिया है। अब उस पार मौर और जूते हैं और इस पार सालियों की एक - एक फ़रमाइशें। सिंदूर दान की रस्म भी हो गई है लेकिन तभी दुलहिन का भाई विद्रोह कर देता है कि मेरी पढ़ी- लिखी बहन इस पागल के साथ नहीं जाएगी। और दुलहे का हाथ पकड़ कर उठाने लगता है। गाँव की औरतें मंडप से उठ कर चली जातीं हैं। कोहबर में ही विवाह टूटने के कगार पर पहुँच जाता है, लेकिन दुलहिन पढ़ी-लिखी है वो जानती है सिंदूर की कीमत। और जिस साहस से वो विवाह की रक्षा करती है, वह अद्भुत है।

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं। आसमान के नीले आँचल में कज़रारे बादल आते थे, बरसते थे, गरज़ते थे, फिर चले भी जाते थे। कुछ हसरतें जवान भी होती थीं, लेकिन मैंने कुछ लिखा नहीं। ज़मीन पर पानी के बनते और मिटते बुलबुलों के बीच जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता का भी आभास हुआ, लेकिन मैंने कुछ लिखा नहीं। शरद पूर्णिमा की रात्रि में चाँद का वैभव और चाँदनी का सिंगार किए तन्वंगी पारिजात की धवलता को भी देखा, लेकिन कुछ लिखा नहीं...।


लोक-पर्व छठ पूजा के दौरान 'सिंदूर' के साथ 'पोतने' जैसी क्रिया का प्रयोग भी देखा। सूर्य को अर्घ्य देती हुई लोकवधुओं की श्रद्धा और आस्था भी देखी। लेकिन कुछ लिखा नहीं...।


और ऐसे में मेरा मानना है कि जब लिखने के लिए कलम न उठ सके, तो पढ़ने के लिए किताबें उठा लेनी चाहिए। कुछ सपने देखने चाहिए और कुछ फ़िल्में देखनी चाहिए। हाँ! इस दौरान मैंने कुछ किताबें पढ़ी, कुछ सपने देखे और कुछ फ़िल्में भी।

उत्तररामचरितम् पढ़ते हुए मुझे वहाँ रुकना पड़ा, जहाँ वासंती ने श्रीराम से पूछा है - राम! तुमने सीता का परित्याग क्यों किया? 

राम दु:ख और क्षोभ से कहते हैं - 'लोको न मर्षतिति'- 'लोक' को सहन नहीं था। सहसा विश्वास नहीं होता कि 'लोक के लिए' अयोध्या नगरी के राजपरिवार ने अनिवर्चनीय कष्ट उठाए। आखिर 'लोक' क्यों इतना महत्त्वपूर्ण है? मैं इस पर सहमत नहीं हो सकता कि मात्र लोक के अच्छा - बुरा लगने के सवाल पर सीता का निर्वासन हो जाए! लेकिन संभव है यह मात्र सीता का निर्वासन न रहा हो, यह राम का भी निर्वासन हो। क्योंकि व्यक्ति उसी को दूर कर सकता है, जिससे अगाध प्रेम भी करता हो। अलगाव की यह आग तो दोनों को समान रूप से सुलगाती होगी न! राम को तो इस योग्य भी नहीं समझा गया कि एक व्यक्ति को 'पिता' बनने का समाचार दिया जा सके। सीता को निर्वासन के समय लोक ने आपादमस्तक अपनाया। लेकिन राम? उन्हें तो नगर और लोक दोनों का कोपभाजन बनना पड़ा। आखिर क्यों? शायद जवाब वही है - लोको न मर्षतिति - लोक को पसंद नहीं था। समझ में नहीं आता कि 'लोक' इतना महत्त्वपूर्ण क्यों और कैसे है? मैंने उत्तररामचरितम् बंद कर दिया और सो गया। 


इधर 'लोक' में धान की कटाई चल रही है। शरद पूर्णिमा की रात्रि का जो चंद्रमा खीर को अमृत बनाने की कला जानता है वही चाँद हमारे खेतों में फ़ैली धान की बालियों में बंद कच्चे चावलों में दूध भी भरता है। इस दिन से धान की कटाई - पिटाई शुरू हो जाती है। घर - दुआर धान से फटने लगता है। इन दिनों मेघाच्छादित आकाश को देखकर कवियों का हृदय भी धड़कता है और किसानों का भी। लेकिन अंतर बस इतना है कि कुछ बूँदें बरस गईं तो कविता बन जाएगी और कुछ बूँदें बरस गईं तो धान की फ़सल बिगड़ जाएगी। ऐसी परिस्थितियों में पढ़ना भी छूट जाता है। और जब पढ़ाई में भी मन न लगे तो सपने सहारे बन सकते हैं। शायद ऐसी ही किसी एक रात सपने में मैंने देखा कि ललित निबंधों की त्रयी में से दो लोग हजारीप्रसाद द्विवेदी और विद्या निवास मिश्र बैठे हैं मेरे सामने। और द्विवेदी जी ने पूछा है - का होऽ मिश्र जी! 'चंद्रमा मनसो जात:' और 'ताडवं देवि भूयादभीष्टयै च हृष्ट् च न' जैसे शास्त्रीय शीर्षक वाले निबंध लिखने के बाद 'टिकोरा' और 'होरहा' जैसे गंवई और लोकोचित शीर्षक से निबंध लिखने की क्या आवश्यकता थी? 

विद्यानिवास मिश्र जी ने कहा है कि - भइया! "जो शास्त्रों में नहीं मिलता वो लोक में मिलता है"। 

लगता है जैसे मेरे सैकड़ों - हज़ारों सवालों के जवाब एक साथ मिल गए हैं। कितनी गहरी बात है कि जो शास्त्रों में नहीं मिलता वो भी लोक में मिलता है। इसीलिए शास्त्रों से भी ऊपर लोक की प्रतिष्ठा है, नगर से ज्यादा गाँव सम्मानित है और द्वारिका के सैकड़ों सुखों पर ब्रजभूमि के गाँवों का लाखों अभाव भी भारी है। लोक की इसी मर्यादा का पालन करने के लिए राम-सीता का विग्रह हुआ और तब जाकर सीता के साथ माता लगता है तथा राम के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम। 


कबीर जैसा विद्रोही व्यक्तित्व भी लोक के आचारों की अभिव्यक्ति करता है तो कहता है कि - 'दुलहिन गावहुँ मंगलाचार'। कितने आश्चर्य की बात है यह कि जप- तप, पूजा, हवन, नमाज़-रोज़े को व्यर्थ बताने वाले कबीर ख़ुद कह रहे हैं कि दुलहिनों 'मंगलाचार' गाओ... तीर्थाटन को व्यर्थ कहने की हिम्मत रखने वाले कबीर अपनी मर्ज़ी से कहते हैं - 'रामदेव संगि भाँवरि लैंहुँ' और वो भी राग गौड़ी में कहते हैं। ये मंगलाचार ये भाँवर (फेरे) ये राग गौड़ी, लोक के लोकाचार हैं, इसलिए इनका विरोध कबीर तक ने नहीं किया। 


लोकसाहित्य में स्पष्ट लिखा है कि लोकाचार के समय कोई बात शास्त्रों में वर्णित नहीं है और अगर उसे गाँव की कोई वृद्धा करने के लिए कहती है तो उसे करना अनिवार्य है। 


लोकाचार से याद आया अभी एक फ़िल्म भी देखी -उज्ज्वल पांडेय की 'कोहबर'। जिन लोगों ने 'नदिया के पार' देखी होगी उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं कि यह फिल्म अपनी आँचलिकता और अपने लोकाचार से कैसे बाँध लेती है!


लोक का आचरण ही लोक का व्याकरण है और परंपराएँ ही इसके सिद्धांत। यहाँ का मिठास महुवई है रंग धूसर। आकार अनगढ़ है और स्वरूप विशद्। इसलिए बाँध लेने का गुण हर लोक की खूबी है। 


ठीक ऐसे ही बाँध लेने वाली फिल्म है कोहबर। जब नाम ही है कोहबर तो दुलहा इसमें भी होगा ही। लेकिन है एकदम भोला सरल और गंवई, कोहबर में जाने की खुशी में मगन। और इधर चतुर सालियों ने दुलहे का जूता ही नहीं मौर तक ग़ायब कर दिया है। अब उस पार मौर और जूते हैं और इस पार सालियों की एक - एक फ़रमाइशें। सिंदूर दान की रस्म भी हो गई है लेकिन तभी दुलहिन का भाई विद्रोह कर देता है कि मेरी पढ़ी- लिखी बहन इस पागल के साथ नहीं जाएगी। और दुलहे का हाथ पकड़ कर उठाने लगता है। गाँव की औरतें मंडप से उठ कर चली जातीं हैं। कोहबर में ही विवाह टूटने के कगार पर पहुँच जाता है, लेकिन दुलहिन पढ़ी-लिखी है वो जानती है सिंदूर की कीमत। और जिस साहस से वो विवाह की रक्षा करती है, वह अद्भुत है। और अद्भुत है दुलहे के रूप में राजू उपाध्याय का अभिनय। दुलहिन के रूप में मनीषा राय की कज़रारी आँखें और उन आँखों में अदम्य साहस और जिजीविषा। साली के रूप में शालू कुशवाहा की छेड़छाड़ गज़ब का है तो सतीश गोस्वामी दुलहिन के भाई के रूप में फ़िल्म के प्रवाह को बनाए रखते हैं। फ़िल्म के अंत का गीत जो साधारण सैमसंग मोबाइल से रिकार्ड किया गया है वो इस फ़िल्म का प्राण तत्त्व है।


उज्ज्वल पांडेय प्रसिद्ध शाॅर्टफिल्म निर्माता - निर्देशक हैं। इनकी फिल्में पहले भी चर्चित रहीं हैं। मैरिज़ हाॅल और आॅनलाइन फेरों के इस दौर में लोक, लोकाचार, लोकगीत को लेकर फ़िल्म बनाना और महीने भर में पच्चीस हज़ार से ज़्यादा दर्शकों की सराहना बताती है कि लोक जिवित है और रहेगा...



- असित कुमार मिश्र, बलिया

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