बन्द होनी चाहिए शर्मसार करने वाली प्रतियोगितायें



''आधुनिकता के नाम पर नग्नता यही देश का दुर्भाग्य है. हमारे पूर्वज क्या थे, और आज हम कहाँ जा रहे हैं, आज दो नारी चर्चा में हैं, एक रानी पद्मावती, एक गौरवशाली इतिहास का ऐसा हिस्सा, जिसका चेहरा देखने के लिए युद्ध हुआ. रानी के सम्मान की रक्षा के लिए हजारों राजपूत वीर शहीद हुए हैं आज भी नारी सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई हिन्दू समाज लड़ रहा है. वहीँ दूसरी तरफ भंसाली मानसिकता वाले लोग हैं, जो नारी को आधुनिकता के नाम पर पूर्णत नग्न रूप में प्रतिस्थापित करना चाहते हैं.'' 

उड़ा उड़ा सुन रखा था कि ये विश्व सुन्दरी यूँ ही नहीं बनतीं, बहुत कुछ खोकर बनती हैं. ऐसा लगता नहीं था, लेकिन ये पिक्स देखकर वास्तविकता सामने है. 

पिक्स हाल ही विश्वसुन्दरी मानसी छिल्लर के बताये गए हैं. लेखिका कमेन्टर दिव्या श्रीवास्तव की फेसबुक प्रोफाइल से यह खबर दी जा रही है. पोस्ट में दिव्या श्रीवास्तव ने सवाल खड़ा किया है नग्नता में कैसी योग्यता? स्त्री की सुंदरता उसकी लज्जा में है. इस तरह खुद को सरेआम निर्वस्त्र करके प्रथम आने में कौन सा गौरव है भला. पता नहीं वे कौन से माता पिता हैं, जो अपनी बेटियों की नग्नता देखकर गौरवान्वित होते हैं. उन्होंने कहा है बन्द होनी चाहिए इस तरह की बेहूदी और शर्मसार करने वाली प्रतियोगिताएं.

पोस्ट की पिक्स हमारी संस्कृति के इतनी ज्यादा खिलाफ हैं कि हम उन्हें यहाँ ज्यों का त्यों नहीं दे पा रहे दिव्या जी ने भी बहुत सोचा होगा, पर यदि ये सच सामने नहीं लाया जाएगा, तो फिर सुधार की बात कैसे होगी. जब तक ये चित्र किसी की आंख के सामने नहीं आएंगे तब तक इस प्रतियोगिता के पीछे की गंदी मानसिकता का एहसास नहीं होगा किसी को.

पोस्ट पर कई लोग कह रहे है कि इस विषय पर चुप रहना ही बेहतर है, बातों से बातें निकलेंगी, सो चुप रहना ही बेहतर है, लेकिन इस प्रकार के लज्जाविहीन संस्कारों का विरोध क्यों न किया जाए?  ओमप्रकाश सिंह ठाकुर ने कहा है यह निदंनीय है, हमारी संस्कृति और सभ्यता का घोर उल्लंघन हो रहा है. आपत्ति क्यों नहीं होनी चाहिए. अश्लीलता और नग्नता, समाज के अन्य कमउम्र बच्चों की मानसिकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है. कमलापति त्रिपाठी का कहना है कि पश्चिमी संस्कृति के अन्धानुकरण करते हुए हम भारतीय संस्कृति, गरिमा, अस्मिता को सत्यानाश ही नही कर रहे बल्कि भावी पीढ़ी के भविष्य को भी बिगाड़ रहे है. लज्जा ही तो स्त्री का आभूषण है. नग्नता तो उसे पशु श्रेणी में ही ले जायेगी.

राजीव तोमर ने कहा है आधुनिकता के नाम पर नग्नता यही देश का दुर्भाग्य है. हमारे पूर्वज क्या थे, और आज हम कहाँ जा रहे हैं, आज दो नारी चर्चा में हैं, एक रानी पद्मावती, एक गौरवशाली इतिहास का ऐसा हिस्सा, जिसका चेहरा देखने के लिए युद्ध हुआ. रानी के सम्मान की रक्षा के लिए हजारों राजपूत वीर शहीद हुए हैं आज भी नारी सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई हिन्दू समाज लड़ रहा है. वहीँ दूसरी तरफ भंसाली मानसिकता वाले लोग हैं, जो नारी को आधुनिकता के नाम पर पूर्णत नग्न रूप में प्रतिस्थापित करना चाहते हैं. 

उन्होंने लिखा है ये शर्मसार करने वाली प्रतियोगितायें विकृत मानसिकता की देन हैं. ये स्त्री की सुन्दरता का अपमान हैं. हिन्दू धर्म का अपमान हैं. सुन्दरता के नाम पर स्त्री को शर्मसार करने वाली ये प्रतियोगितायें बन्द होनी चाहिए.

असल में पूर्व में शरीर सौष्ठव प्रतियोगिताएं पुरुषों में होया करती थीं. दंगल भी हुआ करते थे, अभी भी पहलवान अखाड़ा चलते हैं. समानता के दौड़ में यह सब होने लगा बाजारवाद मिस इंडिया, मिस नगर सुन्दरी और मिस वर्ल्ड जैसी चीजें ले आया. यह कहाँ जा रहे हैं हम, सोचना तो अवश्य होगा. 

उषा सक्सेना 
 द फायर से 

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