स्वच्छता मिशन के बाबजूद प्रदेश के 20% स्कूल शौचालय विहीन


बेहाल शिक्षा बदहाल स्कूल 



प्रदेश के दूरदराज के जिलों में हालात आज भी वाकई चिंताजनक हैं। मुख्यमंत्री तो अपने स्तर पर योजना बनाते हैं, उन पर अमल करने के निर्देश देते हैं। सरकार कोई भी हो, हर क्षेत्र में विकास चाहती है, लेकिन जब योजनाओं पर अमल ईमानदारी से नहीं होता, तो ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं। सरकार को इन आंकड़ों को झुठलाने के बजाय, और गंभीर रवैया अपनाना होगा। नई पीढ़ी के भविष्य का सवाल जो है।

@ संजय सक्सेना


मध्यप्रदेश में शिक्षा के मामले में काफी काम हुआ है, लेकिन तस्वीर आज भी काफी कुछ धुंधली ही नजर आ रही है। सरकार तो दावा करती है कि स्कूलों में पढ़ाई स्थिति और व्यवस्था को बेहतर की गई है। शिक्षकों की भर्ती भी लगातार चल रही है। लेकिन दूसरी ओर जो सर्वे आ रहे हैं, उनमें ये सारे दावे एकदम खोखले ही साबित हो रहे हैं। 

हाल ही में कुछ संस्थाओं ने अलग-अलग सर्वे किए हैं। यही नहीं सीएजी की रिपोर्ट में तो पिछले कई वर्षों से लगातार स्कूलों की बदहाली की रिपोर्ट आती रही है। सर्वेक्षणों में सामने आया है कि कहीं स्कूल में शौचालय नहीं हैं तो कहीं सफाई कर्मचारी नहीं हैं और सफाई का जिम्मा खुद बच्चों पर डाल दिया गया हैं। वे पढ़ने के साथ ही स्कूलों में सफाई का काम भी करते हैं। 

स्कूलों में मिलने वाले मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी बच्चों ने और उनके अभिभावकों ने असंतोष व्यक्त किया है। विकास संवाद ने यूनिसेफ और दस संस्थाओं के साथ मिलकर प्रदेश के 10 जिलों के स्कूलों में जो सर्वे में हुआ है, उसमें शिक्षा की बदहाली का नजारा ज्यादा दिखाई देता है। इन संस्थाओं ने प्रदेश के भोपाल, पन्ना, रीवा, सतना, उमरिया, शिवपुरी, हरदा, खंडवा, झाबुआ, छतरपुर जिलों के करीब 2300 बच्चों पर सर्वे किया है। सर्वे में प्राइमरी से लेकर हायर सेकंडरी स्कूलों के बच्चों को शामिल किया गया था। बच्चों से सवाल किया कि शौचालय की स्थिति कैसी है? जवाब आया, 20 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। 14 प्रतिशत स्कूलों में गंदा रहता है। 11 प्रतिशत स्कूलों में कामन शौचालय है। गंभीर मामला यह सामने आया कि 42 प्रतिशत स्कूलों में बच्चे खुद साफ-सफाई करते हैं। उन्हें बारी-बारी से यह करना होता है। 

मध्यान्ह भोजन के सवाल पर 63 फीसदी स्कूलों में संतोषजनक कहा गया, जबकि 31 प्रतिशत स्कूलों में गुणवत्ता खराब बताई गई। 19 प्रतिशत बच्चे मध्यान्ह भोजन नहीं खाते। 11 प्रतिशत बच्चों ने कहा ठीक-ठाक है, जबकि 8 प्रतिशत बच्चों ने कहा वे जातीय भेदभाव के शिकार हैं। यानि मध्यान्ह भोजन के मामले में भी जातिगत आधार देखा जाता है। शिक्षकों की स्थिति यह रही, 64 प्रतिशत बच्चों के लिए 3 शिक्षक हैं और 25 प्रतिशत बच्चों के लिए 2 शिक्षक हैं। 8 प्रतिशत बच्चों पर सिर्फ एक ही शिक्षक। है। 3 प्रतिशत स्कूल शिक्षक विहीन हैं। पढ़ाई की स्थिति पर हालांकि केवल 8 प्रतिशत बच्चों ने कहा पढ़ाई अच्छी नहीं, लेकिन परिणामों के बहुत कम प्रतिशत पर वे कुछ नहीं बोले। 40 प्रतिशत ने कहा पढ़ाई अच्छी है, जबकि 52 फीसदी ने तो जवाब ही नहीं दिया। और 47 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय नहीं था, जबकि 33 प्रतिशत ने कहा है। 20 प्रतिशत स्कूलों में है तो लेकिन बंद है। 25 फीसदी को जरूरत की किताबें नहीं मिलती। 8 फीसदी को किताबें नहीं मिलती।

जो सबसे आश्चर्यजनक बातें सामने आई हैं, उनके अनुसार घर और समाज में बच्चों को अपमान भी झेलना पड़ता है। सर्वे में 28 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्हें घर, स्कूल या बाहर अपशब्द कहे जाते हैं। स्कूल जाते समय बच्चों को किससे डर लगता है पूछने पर 35 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्हें शराब पीकर चलने वालों से डर लगता है, 28 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्हें आवारा जानवरों से डर लगता है।

ये सर्वे आंखें खोलने वाले हैं। भले ही इन्हें सैम्पल सर्वे माना जाए, लेकिन प्रदेश के दूरदराज के जिलों में हालात आज भी वाकई चिंताजनक हैं। मुख्यमंत्री तो अपने स्तर पर योजना बनाते हैं, उन पर अमल करने के निर्देश देते हैं। सरकार कोई भी हो, हर क्षेत्र में विकास चाहती है, लेकिन जब योजनाओं पर अमल ईमानदारी से नहीं होता, तो ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं। सरकार को इन आंकड़ों को झुठलाने के बजाय, और गंभीर रवैया अपनाना होगा। नई पीढ़ी के भविष्य का सवाल जो है।
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