ये हैं सरकारी स्कूलों के हाल, इसलिए किये जा रहे हैं हजारों स्कूल बंद



आप मानें न माने यह स्कूल ही है वह भी राजधानी भोपाल से कोई बहुत दूर का नहीं

सवाल यह है कि शिक्षा विभाग के आला अफसर क्या सिर्फ कमीशन खाने के लिए ही हैं. क्यों मैदानी हकीकत नहीं देखी गई. ऐसे ही कारणों से सरकार प्रदेश भर में अब ऐसे हजारों स्कूल बंद करने जा रही है. ऐसे स्कूल बंद किये जाने चाहिए, लेकिन इस स्थिति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही होना चाहिए. आखिर जनता की गाडी कमाई का बड़ा हिस्सा कब तक ऐसे लुटाया जाता रहेगा, कब तक यही सिखाया जाता रहेगा 'अ' से 'अनार', 'म' से 'मध्यप्रदेश', 'श' से शिक्षा की लचर व्यवस्था.

विदिशा की शमशाबाद तहसील मुख्यालय से करीब 20 कि.मी. दूर खोरा बंजारा बसती का यह सरकारी स्कूल है. स्कूल मुख्य मार्ग से करीब डेढ़ कि.मी. अन्दर जंगल में है, जहाँ पहुँचाने का कच्चा पगडंडी मार्ग है. पेड़ों के झुरमुटों, खेतों की मेड़ों और जबरन के कहीं से भी होकर बनाए गए रास्ते से यहाँ पहुँचना पड़ता है. इसी रास्ते से शिक्षक मान सिंह और शिक्षिका नमिता तोमर यहाँ पहुंचते हैं. खबर पत्रिका में प्रकाशित हुई है.
इस स्कूल में मात्र 4 बच्चे हैं. सभी कक्षा 4 में पढ़ते हैं, और चार साल बाद भी 'अ' 'आ' 'इ' 'ई' सीख रहे हैं. शिक्षक मान सिंह ने बताया है कि पहले स्कूल पेड़ के नीचे लगता था, बाद में 4 लाख से बिल्डिंग बनाई गई लेकिन वह किस हालत में है इसके लिए आप फोटो देखें. 
जी यही वह स्कूल है जो चार लाख में बना
और चार बच्चे यहाँ पढ़ते है
 
सवाल यह है कि शिक्षा विभाग के आला अफसर क्या सिर्फ कमीशन खाने के लिए ही हैं. क्यों मैदानी हकीकत नहीं देखी गई. ऐसे ही कारणों से सरकार प्रदेश भर में अब ऐसे हजारों स्कूल बंद करने जा रही है. ऐसे स्कूल बंद किये जाने चाहिए, लेकिन इस स्थिति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्यवाही होना चाहिए. आखिर जनता की गाडी कमाई का बड़ा हिस्सा कब तक ऐसे लुटाया जाता रहेगा. साथ ही आज भी कई स्कूलों की हालत बदतर है. बच्चे हैं, शिक्षक नहीं या बिल्डिंग नहीं, वहां उचित व्यवस्था की जानी चाहिए. या फिर कब तक यही सिखाया जाता रहेगा 'अ' से 'अनार', 'म' से 'मध्यप्रदेश', 'श' से शिक्षा व्यवस्था.

गोविन्द सक्सेना ने खबर शेयर करते हुए लिखा है कि हम मुख्य मार्ग तक तो बाइक से पहुंच गए, लेकिन वहां से डेढ़ किलोमीटर अंदर पहुंचना किसी सजा से कम नहीं. बेहद पथरीले, ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों नुमा रास्ते से निकलना कष्टदाई है. आगे चलकर ये रास्ता भी खत्म और सिर्फ खेतों की मेड़. किसी तरह हम पहुंचे स्कूल तक। स्कूल क्या है, 2011 में 4 लाख से बना एक ऐसा कमरा, जो आज तक न पूरा बना और न हैंडओवर हुआ. कहीं बीम गिर रही है, कहीं लटकते पिलर से खतरनाक सरिये निकल रहे हैं. न कोई खिड़की है और न कोई दरवाजा. फिर भी यकीन मानिए यह स्कूल है. विद्यार्थी मात्र 4, लेकिन शिक्षक 2, एक महिला एक पुरुष शिक्षक. इस बीहड़ के रास्ते पैदल शिक्षिका कैसे आती है, ये भी एक बड़ी समस्या है. भवन पूरी तरह खंडहर है, लेकिन बलिहारी सरकार की, स्कूल का शौचालय सवा लाख रूपये से एकदम चकाचक बना दिया गया है. यह अलग बात कि उसमें कबाड़ा भरा है. कक्षा 4 के ही बच्चे हैं, वे भी 4, यकीन मानिए 4 साल से पढ़ रहे इन बच्चों को अभी अपना नाम लिखना और किताब की एक लाइन पढ़ना भी नहीं आती। 

वे लिखते हैं धन्य है हमारी अंधी, बहरी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा विभाग, प्रशासन और हमारे हुक्मरान. वाकई आप सब बहुत सजग और संवेदनशील तथा विकासोन्मुखी हैं. वाकई ये बड़े नेताओं का जिला और क्षेत्र है.
यह है स्कूल का रास्ता कभी कोई घटना हो जाए
तो फिर न कहियेगा कि कभी किसी ने बताया नहीं 


दूसरी ओर सफल शिक्षा सेवा समिति विदिशा के माध्यम से शिक्षा देने की लगन वाले शिक्षक को देखें अपने से नि:शुल्क पढ़ा रहे है, बच्चे मैदान में इकट्ठे कर. बिल्डिंग का छोडो, टाटपट्टी भी नहीं, बच्चे अपने घर से बोरे, यूज्ड फ्लेक्स लेकर आते हैं और फिर पढ़ते हैं. ऐसे लोगों को क्यों नहीं प्रोत्साहित किया जाता. 

साभार फोटो : गोविन्द सक्सेना
मनोज कौशल सोनी/डिजिटल इंडिया न्यूज़ डेस्क 


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