रोहिंग्या : राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरे की आशंका काफी नहीं, विधिक आधार जरूरी


बार बार रोहिंगिया के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार की बात की
लेखक : एडवोकेट कुमार पवन 
जाती है. रोहिंगियाओं के समर्थक प्रवक्ता टी.वी.पर आके बार बार सभी व्यक्ति के प्राण एंव दैहिक स्वतंत्रता की बात कर रहा है, पर उसी अनुच्छेद की आगे वाली लाईन "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" को गायब किया जा रहा है? ऐसे ही रोहिगिया के समर्थन में संविधान के उपबंधों को तोड मरोड कर उल्लेख किया जा रहा है और जो संविधान व कानून को गहराई से नहीं जानते वो इनके झाँसे में आ जाते हैं. वकील लोग किसी केस में जब बहस के लिये नोट्स बना लेते हैं, तो उसे हर सुनवाई के तारीख पर लेके आते हैं. रोहिंग्या मामले की सुनवाई की तारीख आने वाली है तो इसी से सम्बंधित विधिक उपबंधों के दायरे में कुछ तर्क पेश कर रहे हैं इलाहाबाद से एडवोकेट कुमार पवन.

अनु0 21 कहता है कि ."राज्य किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिवाये उसके प्राण औऱ दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं करेगा"
बिलकुल ठीक, परंतु किसी विदेशी घुसपैठिये को उसके देश वापस भेजना प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का हनन है क्या? निवास करने देने की स्वतंत्रता की तो बात ही मत करना क्योकि निवास करने की स्वतंत्रता और भारत के किसी भाग में बस जाने की स्वतंत्रता केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है (अनु0 19). और ये भी ध्यान रहे" विदेशी को डिपोर्ट करना विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया है.

चलिये थोडी देर माना रोहिंगिया को भी अनु0 21 के अंतर्गत अधिकार है.
परंतु ये अधिकार घुसपैठियो को बाहर करने वाली विधि की प्रक्रिया के अधीन है. ये अधिकार शरणार्थियो को उनके देश भेजने की प्रक्रिया के अधीन है. राज्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली विधिक प्रक्रिया के अधीन है. न्यायालय को भी कुछ निर्णय देने का संवैधानिक और विधिक आधार चाहिये, परंतु कभी कभी ये देखने में आता है कि कुछ एक सरकारी वकील ठीक से विधिक आधार नहीं सुझा पाते परिणाम कुछ निर्णय संविधान की मूल भावना व राज्य के विरूद्ध आ जाते हैं.

घुसपैठियो को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का आधिकार है तो ये घुसपैठियो को बाहर निकालने ( डिपोर्ट ) करने वाली प्रक्रिया के अधीन है.
घुसपैठियो के प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार राज्य को डिपोर्ट करने के अधिकार पर बिलकुल भी रोक नही लगाती.

जिस प्रकार एक किरायेदार, किरायेपर देने वाले की शक्ति और स्वामित्व पर प्रश्न चिन्ह नही लगा सकता उसी प्रकार शरण लेने वाला भी शरणदेने वाले की उसे वापस भेजने की शक्ति पर प्रश्न चिन्ह नही लगा सकता.
ये सादृस्यता के आधार पर निगमित विधिक सिद्धांत है. सर्वोच्च न्यायालय को इस पर भी ध्यान रखना चाहिये. और फिर डिपोर्ट करना प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का हनन भी तो नही है. ये किस आधार पर कह दिया कि "किसी विदेशी घुसपैठियो को उसके देश मे डिपोर्ट कर देने से दैहिक स्वतंत्रता का हनन हो जायेगा?

भारत की सरकार ने लोक अधिकारियों द्वारा अपने पदाभास मे कार्य करते हुये तैयार की गई रिपोर्ट साक्ष्य मे सौपी है कि रोहिंगियाओ से आतंकी खतरा है. रोहिंगिया की और से ऐसा कौन सा साक्ष्य दिया गया कि डिपोर्ट करने से दैहिक स्वतंत्रता खतरे में पढ जायेगी? केवल काल्पनिक बातों से दैहिक स्वतंत्रता को खतरा पैदा हो जाता है क्या, कहाँ हैं साक्ष्य?

भारत में कही भी संचरण करने व निवास करने की स्वतंत्रता सिर्फ भारत के नागरिकों को प्राप्त है न कि विदेशियो को. ये बात भी ध्यान रखना चाहिये. नागरिकों की भाति विदेशी व्यक्ति के अधिकारों का विस्तृत व उदार निर्वचन नहीं किया जा सकता क्योंकि नागरिक संविधान के भाग 4क में दिए गए मूल कर्तव्यों से बंधे हैं, जबकि विदेशी ऐसे किसी कर्तव्य से बंधे नहीं हैं. 

जब कभी व्यक्ति और नागरिकों के अधिकारों के विस्तार का निर्वचन किया जाये तो कर्तव्यों के प्रवधान को हम नजरंदाज नहीं कर सकते. नागरिकों की प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार और विदेशी घुसपैठियो के दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के विस्तार के बीच विभेद अयुक्तियुक्त नहीं है.

कोई भारत सरकार निरूद्ध करके रोहिंगियाओ के दैहिक स्वतंत्रता का हनन तो करने नही जा रही है वो तो बस उनको सिर्फ वहाँ भेज रही है, जहाँ से वो आये हैं. इससे दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन कहाँ हुआ? भारत सरकार क्यों निवास करने दे? निवास करने और कही पर बस जाने की स्वतंत्रता का अधिकार केवल और केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है. और रोहिंगिया भारत के नागरिक नहीं हैं. और तो और रोहिंगिया के समर्थन में जिस " नागरिक तथा राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा "1966 का उल्लेख किया जा रहा है उसका अनुच्छेद 13 स्वयं प्रावधान करता है कि जहाँ राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा है, वहाँ इस आधार पर विदेशी को निष्कासित किया जा सकता है.

सुरक्षा को खतरा है कि नहीं, इसका निर्धारण देश की सुरक्षा ऐजेंसियों की रिपोेर्ट के आधार पर किया जायेगा न कि किसी विदेशी NGO के पेड वर्कर की बकवास पे. और फिर जिन लोगों के समर्थन में लस्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठन खडे हो गये हों, उनसे खतरे की आशंका न रखना स्वयं को धोखा देना है.

14 दिसम्बर 1967 के सं. रा. महासभा के प्रस्ताव में भी ये स्वीकार किया गया है कि-राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर या अपनी जनता की सुरक्षा के आधार पर या जब बडी संख्या में आश्रय की मांग करते हैं तब आश्रय की प्रार्थना को अस्वीकार किया जा सकता है. तो यहाँ तो राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरे की आशंका है और शरण मांगने वालों की संख्या भी ज्यादा है. उक्त प्रस्ताव के आलोक में राज्य को शरण देने से इंकार करने का अधिकार है. तो जब रोहिंगिया के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के लिये जायें, तो मेरा अनुरोध है थोडा विधिक आधार को भी मजबूत रखें, केवल राष्ट्र की सुरक्षा की आशंका व्यक्त करना ही पर्याप्त नहीं होगा.

घुसपैठियों को बाहर निकालने की प्रक्रिया का उल्लेख करिये, कोर्ट के सामने. यहाँ पे मेनका गाँधी के निर्णय का रेशियो लागू नहीं होगा, विश्वास रखें.  रोहिंगिया के तरफ से घाघ वकील हैं. उनके विरूद्ध जरा सी चूक घातक हो सकती है. और हाँ, राष्ट्र है तो संविधान है. संविधान सुव्यवस्थित राष्ट्र को चलाने के लिये लागू किया गया था. राष्ट्र में सुव्यवस्था लाने के लिये संविधान बनाया गया था. संविधान को चलाने के लिये राष्ट्र नहीं बना.  450 लोग मिल कर संविधान बना सकते हैं, परंतु 450 लोग मिलकर राष्ट्र नहीं बना सकते. 5 लोग मिल कर संविधान के उपबंधो का निर्वचन कर सकते हैं, पर 5 लोग राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते?

पाँच लोगों की भूल को सुधारने में पाँच हजार बलिदान देना पड सकता है. राष्ट्र संविधान से पहले भी था, हाँ संविधान की आड में अगर राष्ट्र के साथ खिलवाड हुआ, तो भूमि तो यही रहेगी लेकिन राष्ट्र नहीं रहेगा.
और राष्ट्र के न रहने पर ये संविधान भी कितने दिन रहेगा. ये भी कोई निश्चय से नहीं कह सकता. और हाँ सरकार को अध्यादेश लाने के लिये भी तैयार रहना चाहिये.  

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