इंतजार

लघुकथा 
 

डाकिए ने हाथ में जब यह पत्र थमाया तो दिल भर आया। अमूमन, सरकारी नौकरियों के नियुक्ति पत्र उल्लास भर देते हैं परंतु मैं रो पड़ा।
पिताजी की ख़्वाहिश थी कि पुत्र सरकारी सेवा में जाए। मेरी काबिलियत पर मुझसे ज्यादा भरोसा उन्हे रहता था। जब से मैंने अपने साक्षात्कार के बारे में बताया था हर रोज डाकिए को टोका करते थे। 
पिछले एक साल से यही सिलसिला चल रहा था। उनका इंतजार देख कर कभी-कभी मैं भी बेचैन हो उठता था। कहता "आप इतने उतावले क्यों हो? समय आने पर पत्र आ जाएगा।" दो दिन पहले ही पिता जी हृदयाघात से चल बसे। आज यदि जीवन की सारी कमाई लेकर भी, कोई उन तक यह पत्र पहुंचा देता तो मैं देने को तैयार था।
@ सौरभ कुमार गौतम, पटना 
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