झोपड़ियाँ




बंजर जमीन पर
खड़ी घास काट कर
बनाई झोपड़ियां ।।
और यही झोपड़ियां उगाएंगी
अब कंक्रीट का बंजर ।


जैसे-जैसे कंक्रीट का मंजर
जमीन फोड़कर उगता जाएगा
झोपड़ियां बोनी होती जाएंगी ।
और एक दिन
बिल्डिंग की ऊंचाई पाते ही ।
सामने से हटा दी जाएंगी
कचरे के ढेर जैसी ।।
चल देंगे मजदूर
अपनी पोटली समेटकर ।
सौंपकर कंक्रीट का मंजर ।।
खरीदता है जिसे
पैसे का कीड़ा
पॉश कॉलोनी के नाम पर।
जिसे सींचा गया है मजदूर के खून से

हाथों में छाले और
पेट मे दो निवाले आए
उसके हिस्से ।
फिर अब ना घुसने दिया जाएगा
उस छाले वाले
खाली कुठले के आदमी को ।
जिस ने खड़ा किया है वही महल।
प्रवेश द्वार पर चौकीदार ही रोक देगा
और भगा देगा ।
तब तक
जब तक कंक्रीट के जंगल में
छाले नहीं पड़ जाते ।
चुहाता नहीं है या
उखड़ता नहीं है प्लास्टर उसका
तब तक प्रवेश निषेध रहेगा ।
बिल्कुल वर्ण व्यवस्था की रोकती
कटीली दीवारों कि तरह।।
© मोतीलाल आलमचन्द्र
तहसीलदार श्यामपुर

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